भाजपा : यूपी ,बिहार के बाद झारखंड में भी ओबीसी अध्यक्ष के मायने ,आदित्य साहू के लिए कितनी बड़ी चुनौती !!

    झारखंड में सामाजिक और राजनीतिक ताना-बाना उलझा हुआ है और यही वजह है कि लगभग सभी पार्टियों को इससे जूझना पड़ता है

    भाजपा : यूपी ,बिहार के बाद झारखंड में भी ओबीसी अध्यक्ष के मायने ,आदित्य साहू के लिए कितनी बड़ी चुनौती !!

    धनबाद(DHANBAD) |  झारखंड बीजेपी अध्यक्ष के लिए सिर्फ एक नामांकन सामने आया और आदित्य साहू झारखंड प्रदेश भाजपा अध्यक्ष चुन लिए गए.  इसके बाद सवाल उठ रहे हैं कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की रेस में शामिल अन्य लोगों  को क्या भरोसे में ले लिया गया या फिर उन्हें मना  कर दिया गया.  नामांकन करने से पहले झारखंड में बीजेपी अध्यक्ष बनने की रेस में कई लोग शामिल थे.  हालांकि आदित्य साहू के कार्यकारी अध्यक्ष मनोनीत किए जाने के बाद से यह बात साफ हो गई थी कि वही प्रदेश अध्यक्ष बनेगे. . अब  उत्तर प्रदेश, बिहार के बाद झारखंड में भी ओबीसी के चेहरे के भरोसे बीजेपी आगे बढ़ेंगी.  उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाया गया है, तो बिहार में संजय सरावगी  प्रदेश अध्यक्ष है.  झारखंड में  भी ओबीसी चेहरे पर दांव  लगाते हुए आदित्य साहू का चयन किया गया है.  मतलब झारखंड में भाजपा आदिवासी और ओबीसी के बीच समन्वय बैठा कर  आगे काम करेगी.  हालांकि भाजपा के लिए यह प्रयोग झारखंड में कोई नया नहीं है.  इसके पहले भी रघुवर दास, अर्जुन मुंडा और बाबूलाल मरांडी के रूप में प्रयोग किया जा चुका है. 

    भाजपा झारखंड में पहले भी यह प्रयोग कर चुकी है ---
     
    एक समय बाबूलाल मरांडी झारखंड के मुख्यमंत्री थे, फिर आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा भी मुख्यमंत्री रहे, फिर ओबीसी नेता रघुवर दास भी मुख्यमंत्री रहे.  फिर एक बार भाजपा ने आदिवासी नेता बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष और ओबीसी समुदाय के आदित्य साहू को प्रदेश की कमान दी  है.  मतलब साफ है कि अब ओबीसी और आदिवासी समाज की राजनीति कर बीजेपी झारखंड में आगे बढ़ेगी.  लेकिन इसका परिणाम क्या होगा, आदित्य साहू को भाजपा के बड़े नेताओं का कितना समर्थन मिलेगा, यह एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है. निकाय चुनाव से भी बहुत कुछ साफ़ हो जाएगा.  वैसे कहा जा रहा है कि आदित्य साहू का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना केवल नेतृत्व परिवर्तन मात्र नहीं , बल्कि संगठन को नए सिरे से खड़ा करने का संकेत भी है.  आगे यह  देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनावी राजनीति, सामाजिक समीकरण और कार्यकर्ताओं के मनोबल को  आदित्य साहू कितनी मजबूत  दिशा दे पाते है. 

    झारखंड में सामाजिक और राजनीतिक ताना-बाना क्यों उलझा हुआ ?
     
    झारखंड में सामाजिक और राजनीतिक ताना-बाना उलझा हुआ है और यही वजह है कि लगभग सभी पार्टियों को इससे जूझना पड़ता है.  2019 हुए विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भाजपा को उम्मीद के अनुसार सफलता नहीं मिली.  जिससे कार्यकर्ताओं में भी बहुत उत्साह नहीं दिखता.  ऐसे में नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए संगठन को फिर से खड़ा करना और उसे  सही राह दिखाना एक बड़ी चुनौती होगी.  हालांकि आदित्य  साहू के बारे में कहा जाता है कि वह संगठन से जुड़े नेता है और संगठन को मजबूत करने में माहिर  माने जाते है.  फिलहाल झारखंड में भाजपा आदिवासी -ओबीसी और शहरी मतदाताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है.  देखना है आगे -आगे होता है क्या? बंगाल चुनाव और निकाय चुनाव बहुत कुछ बता सकता है.

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो


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