पैदल नहीं हाथों पर चल कर बाबाधाम पहुंचते हैं अशोक, जानिए कौन है यह अद्बभुत भक्त

    पैदल नहीं हाथों पर चल कर बाबाधाम पहुंचते हैं अशोक, जानिए कौन है यह अद्बभुत भक्त

    दुमका (DUMKA) : भक्ति में गजब की शक्ति होती है. भक्ति चाहे ईश्वर की हो या राष्ट्र की. आपने कई भक्त देखे होंगे, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे भक्त के बारे में बताने जा रहे हैं जिनमे ईश्वर के साथ साथ देश भक्ति कूट कूट कर भरी है. दरअरस, देवघर के बाबा बैद्यनाथ और दुमका के बाबा बासुकीनाथ की महत्ता जग जाहिर है. प्रत्येक वर्ष सावन के महीने में देश विदेश के लाखों श्रद्धालु बिहार के सुल्तानगंज के उत्तरवाहिनी गंगा से जल भर कर बाबा बैद्यनाथ पर जलार्पण के बाद बाबा बासुकीनाथ पर जल अर्पित करते है. कोई सामान्य बम के रूप में जलार्पण करते है तो कोई डाक बम के रूप में. सुल्तानगंज से बासुकीनाथ के रास्ते में सालों भर कुछ ऐसे भक्त भी मिल जाएंगे जो दंड प्रणामी देते हुए बाबा के दरबार में पहुंचते हैं. लेकिन इस सब के बीच देवघर से बासुकीनाथ के रास्ते एक ऐसे भक्त दिखाई दिए गए हैं जो हाथों पर चल कर सुल्तानगंज से बासुकीनाथ पहुंचे है.

    किसी से दान नहीं लेते भक्त अशोक 

    इन भक्त का नाम अशोक गिरी उर्फ मनु सोनी है. कहां के रहने वाले है पूछने पर कहते है भारत देश के हैं. सही मायने में ये भारत मां के सच्चे सपूत है. जब ये हाथ के बल चलते है तो इनकी पीठ पर गंगा जल के साथ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा भी रहता है. राष्ट्रीय ध्वज का अपमान ना हो इसका पूरा ध्यान रखते है. जहां विश्राम करना होता है वहां तिरंगा को किसी पेड़ पर रखते हैं. यात्रा शुरू करने से पहले तिरंगा को आरती दिखा कर पूजा करते हैं. फिर निकल पड़ते हैं मंजिल की ओर. हाथ के सहारे कुछ मिनट चलने के बाद एक क्षण के लिए खड़े होते है और फिर शुरू हो जाते हैं हाथ के सहारे चलने का सिलसिला. सुल्तानगंज से अब तक 156 दिन ये चल चुके हैं. फिलहाल देवघर से निकलकर बासुकीनाथ के रास्ते में हैं और उम्मीद है कि बासुकीनाथ पहुंचने में इन्हें एक सप्ताह और लग सकता है. लेकिन सबसे आश्चर्य की बात है कि हथेली में अभी तक शिकन भी नहीं पड़ा है. इसके पूर्व गंगोत्री से रामेश्वरम तक कि पदयात्रा कर चुके हैं. कहते है जगत कल्याण के लिए इनके गुरु ने इन्हें भक्ति मार्ग पर चलने का उपदेश दिया है. जिसका ये पालन कर रहे हैं.

    हठयोग का जीता-जागता उदाहरण

    अशोक गिरी की भक्ति को हठयोग कहा जा सकता है. तभी तो रास्ते मे इन्हें हाथों के बल चलते देख लोग दांतो तले अंगुली दबा लेते है. लोग इनकी ईश्वर भक्ति के साथ साथ देश भक्ति देख मुरीद हो जाते है. बासुकीनाथ के लोग कहते है कि अपने जीवन में ऐसा भक्त पहली बार देखा है जो हाथ के सहारे सुल्तानगंज से चल कर बासुकीनाथ पहुंच रहे हैं. सबसे बड़ी बात अगर कोई इन्हें रुपया देना चाहते है तो लेने से इनकार कर देते हैं. अगर कोई जबरन रुपया देकर आगे बढ़ गया तो ये उसे गरीब के बीच बांट देते हैं. पूरी यात्रा के दौरान ये फल का सेवन करते है इसलिए मात्र फल ही स्वीकार्य करते हैं.

    भक्ति के रूप अनेक

    तो देखा आपने भक्ति के कई रूप होते है. कोई सामान्य बम बनकर तो कोई डाक बम बनकर बाबा के शरण मे आते हैं. कई भक्त दंड प्रणामी देकर पहुंचते हैं. लेकिन इस सबके बीच अशोक गिरी हाथ के बल चलकर बासुकीनाथ पहुंचने वाले हैं जो प्रभु भक्ति के साथ-साथ राष्ट्रभक्ति का संदेश दे रहे हैं. तभी तो कहा जाता है कि भक्ति में गजब की शक्ति होती है.

    रिपोर्ट : पंचम झा, दुमका


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