झारखंड गठन के बाद पहली बार नगर निकाय चुनाव: किसने जीता था मेयर पद, कैसा हुआ था मुकाबला

    झारखंड गठन के बाद पहली बार नगर निकाय चुनाव: किसने जीता था मेयर पद, कैसा हुआ था मुकाबला

    टीएनपी टेस्क(TNP DESK): झारखंड राज्य का गठन 15 नवंबर 2000 को हुआ. अलग राज्य बनने के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी स्थानीय निकायों को सक्रिय करना और शहरी प्रशासन को लोकतांत्रिक ढांचे में मजबूत करना. हालांकि शुरुआत आसान नहीं रही. कई सालों तक नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों में नियमित चुनाव नहीं हो सके और प्रशासनिक व्यवस्था प्रशासकों के माध्यम से चलती रही. इससे शहरी विकास की गति और जवाबदेही दोनों प्रभावित हुईं.

    पहली बार कब हुआ नगर निकाय चुनाव?

    झारखंड में अलग-अलग नगर निकायों में चुनाव अलग-अलग वर्षों में संपन्न हुए. राजधानी रांची में पहली बार 2008 में नगर निगम चुनाव कराया गया. यह राज्य गठन के लगभग आठ वर्ष बाद हुआ और इसे शहरी लोकतंत्र की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना गया. कोयला नगरी धनबाद में नगर निगम का गठन 2006 में हुआ, लेकिन पहला चुनाव 2010 में आयोजित किया गया. जमशेदपुर में स्थिति अलग रही. यहां टाटा स्टील के अधीन जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति (JNAC) लंबे समय से कार्यरत रही, जिसके कारण नियमित नगर निगम चुनाव नहीं हो सके. करीब 44 वर्षों बाद यहां पूर्ण निकाय चुनाव की चर्चा और तैयारी ने राजनीतिक माहौल को गरमाया. मेदनीनगर (पलामू) में नगर निकाय चुनाव 2018 में हुआ, जहां मुकाबला काफी दिलचस्प रहा.

    प्रमुख नगर निगमों के चुनाव परिणाम

    रांची नगर निगम

    राजधानी रांची में हुए पहले नगर निगम चुनाव में रमा खलखो पहली महापौर निर्वाचित हुईं. उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की. यह परिणाम महत्वपूर्ण इसलिए था क्योंकि इससे संकेत मिला कि मतदाताओं ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि को प्राथमिकता दी. पानी, सफाई, सड़क, स्ट्रीट लाइट और बुनियादी सुविधाएं चुनाव के केंद्र में थीं. उनकी जीत को रांची की जनता की बदलाव की इच्छा और स्थानीय नेतृत्व पर भरोसे के रूप में देखा गया.

    धनबाद नगर निगम

    धनबाद नगर निगम का पहला चुनाव 2010 में हुआ. उस समय मेयर सीट सामान्य महिला के लिए आरक्षित थी. चुनाव बेहद रोचक और बहुकोणीय मुकाबले वाला था. पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रो. रीता वर्मा, इंदु देवी, डॉ. किरण सिंह, डॉ. शिवानी झा, डॉ. उर्मिला सिन्हा सहित कई प्रभावशाली उम्मीदवार मैदान में थे। भाजपा के अंदर भी दो ध्रुव बन गए थे एक खेमा इंदु देवी के समर्थन में था तो दूसरा प्रो. रीता वर्मा के पक्ष में. अंतत इंदु देवी मेयर बनीं.

    इसके बाद 2015 में फिर चुनाव हुआ, जो पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित था. इस बार भी मुकाबला दिलचस्प रहा. प्रदीप संथालिया ने बीच चुनाव में मैदान छोड़ने की घोषणा की. अंतत चंद्रशेखर अग्रवाल विजयी रहे, जबकि शमशेर आलम दूसरे स्थान पर रहे. भाजपा के भीतर समर्थन को लेकर रणनीति बदलती रही और राजकुमार अग्रवाल को समर्थन दिया गया. 2026 के चुनाव में भी समर्थन की राजनीति और गुटबाजी चर्चा का विषय बनी हुई है.

    मेदनीनगर नगर निगम

    मेदनीनगर में 2018 के चुनाव में अरुणा शंकर और पूनम सिंह के बीच कड़ा मुकाबला हुआ यह चुनाव स्थानीय मुद्दों और महिला नेतृत्व की परीक्षा के रूप में देखा गया. जनता ने अरुणा शंकर पर भरोसा जताया और उन्हें जीत दिलाई.

    चुनाव की खास बातें

    1. महिला भागीदारी में वृद्धि – आरक्षण लागू होने के बाद बड़ी संख्या में महिलाएं मेयर, डिप्टी मेयर और पार्षद पदों पर चुनी गईं.
    2. निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रभाव – कई स्थानों पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने दलों को कड़ी चुनौती दी और जीत हासिल की.
    3. स्थानीय मुद्दों का दबदबा – सड़क, पानी, सफाई, अतिक्रमण, जल निकासी और स्ट्रीट लाइट जैसे मुद्दे मुख्य रहे.
    4. उच्च मतदान प्रतिशत – जनता ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिससे स्पष्ट हुआ कि लोग स्थानीय शासन में सीधी भागीदारी चाहते हैं.

    बाद के चुनाव और राजनीतिक परिपक्वता

    2015-16 के दौरान कई नगर परिषद और नगर पंचायतों में चुनाव हुए. इस चरण में राजनीतिक दलों की सक्रियता और रणनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा. 2018 में भी कुछ निकायों में चुनाव संपन्न हुए, हालांकि परिसीमन, आरक्षण और कानूनी विवादों के कारण देरी और अड़चनें भी सामने आईं.

    चुनावों का प्रभाव

    नगर निकाय चुनावों ने झारखंड के शहरी प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा दिया. चुने हुए प्रतिनिधियों के आने से स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी), अमृत योजना और अन्य विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में तेजी आई. हालांकि वित्तीय संसाधनों की कमी, प्रशासनिक समन्वय की चुनौतियां और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसी समस्याएं बनी रहीं.

    झारखंड में नगर निगम और नगर निकाय चुनावों की शुरुआत भले ही देर से हुई, लेकिन इन चुनावों ने शहरी लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी. 2008 और 2010 के चुनाव ऐतिहासिक मील के पत्थर साबित हुए. इसके बाद हुए चुनावों ने राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, महिला नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में ला दिया. आज झारखंड के शहरों में जो विकास दिखाई देता है, उसकी बुनियाद इन्हीं चुनावों में निहित है. स्थानीय निकाय चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जमीनी लोकतंत्र को मजबूत करने की सतत यात्रा है.


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