टाइगर जयराम को लोबिन हेम्ब्रम का झटका! देखिये कैसे महतो-कुड़मी के लिए आदिवासी दर्जे की मांग ने बिगाड़ा पूरा खेल

    टाइगर जयराम को लोबिन हेम्ब्रम का झटका! देखिये कैसे महतो-कुड़मी के लिए आदिवासी दर्जे की मांग ने बिगाड़ा पूरा खेल

    Ranchi- संथाल और कोल्हान की राजनीति में टाईगर जयराम को बड़ा झटका लगता हुआ दिख रहा है. और इसका कारण बना है, टाईगर जयराम के द्वारा कुड़मी-महतो जाति के लिए आदिवासी दर्जे की मांग का समर्थन. अपने कई बयानों में जयराम खुल कर कुड़मी-महतो के लिए आदिवासी दर्जे की मांग का समर्थन करते नजर आये हैं. और यही वह कमजोर कड़ी है, जहां से लोबिन हेम्ब्रम और टाईगर जयराम की राह जुदा होती नजर आने लगी है.

    संताल की राजनीति में उलटफेर करने का इरादा रखते हैं जयराम

    यहां ध्यान रहे कि कोडरमा, गिरिडीह, रांची, हजारीबाग की लोकसभा सीटों के साथ ही टाईगर जयराम की हसरत संथाल और कोल्हान इलाके में भी सियासी हलचल पैदा करने की थी. दावा किया जा रहा था कि जयराम संताल और कोल्हान में अपनी सियासी जमीन की तलाश कर रहे हैं, और इस सियासी जमीन की तलाश में उनकी नजर आदिवासी-मूलवासी समुदाय का फायर ब्रांड नेता माने जाने वाले लोबिन हेम्ब्रम पर टिकी थी, जयराम का मानना था कि यदि लोबिन दा का साथ उनकी नयी नवेली पार्टी को मिल जाये तो वह झारखंड की सियासी फिजा में ताजी हवा का झोंका भर सकते हैं. भले ही वह जीत की दहलीज तक नहीं पहुंचे, लेकिन इस प्रयास से आदिवासी मूलवासियों का सवाल एक बार फिर से झारखंड की सियासत का केन्द्र बिन्दू में आ खड़ा होगा, और तमाम राजनीतिक दलों के सामने अपने-अपने संगठनों में आदिवासी-मूलवासियों को चेहरा बनाने की राजनीतिक विवशता कायम हो जायेगी, और यही जयराम की नयी नवली पार्टी की प्रारम्भिक सफलता होगी.

    जयराम ने लोबिन के सामने बढ़ाया था दोस्ती का हाथ

    दावा किया जाता है कि इसी कोशिश में जयराम ने लोबिन दा के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, यहां यह भी ध्यान रहे कि जल जंगल और जमीन, आदिवासी अस्मिता और मूलवासी पहचान की लड़ाई लड़ते रहे लोबिन हेम्ब्रम अपने तीक्ष्ण सवालों से कई बार अपनी ही पार्टी को संकट में डालते दिखलायी पड़ते हैं. जिसके कारण वह खुद झामुमो की राजनीति में हासिये पर खड़े दिखलाई देते हैं. जयराम की सोच थी कि लोबिन दा उन्ही सवालों को अपने अंदाज में स्वर देते रहे हैं, जिसकी वकालत वह अपने संभ्रात शब्दों में करते रहे हैं, दोनों की भाषा और शब्दावलियां अलग-अलग होती है, अंदाजे बयां भी अलग होता है, लेकिन निशाना एक ही होता है. तो क्यों नहीं लोबिन दा को अपने साथ खड़ा कर सियासत की नई लकीर खींची जाए.

    जयराम एक उर्जावान और जुझारु नेता

    लेकिन जयराम के इन प्रयासों को धक्का तब लगा, जब लोबिन ने अपने ठेठ देशी अंदाज में यह साफ कर दिया कि जयराम के सवाल तो ठीक है, वह एक उर्जावान और जुझारु नेता है. आदिवासी-मूलवासी समाज के सामने खड़े समकालीन सवालों का उसे गहरी समझ है, लेकिन जिस प्रकार से उसके द्वारा कुड़मी-महतो के लिए आदिवासी दर्जे की मांग का समर्थन किया जा रहा है, वह आदिवासी समाज के भविष्य के लिए बेहद घातक होगा, और हम किसी भी कीमत पर आदिवासी हितों के साथ समझौता नहीं कर सकते.

    सियासत की पिच पर जल्दबाजी ठीक नहीं

    लोबिन इस बात को स्वीकार करते हैं कि जयराम ने उनसे सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश की थी, इसके पहले भी कई बार उससे बात हो चुकी है, लेकिन उसकी बातों से लगता है कि वह बहुत जल्दबाजी में है, जबकि हमारी लड़ाई लम्बी और पेचदीगियों से भरा पड़ा है, जो आज हमारे दोस्त नजर आते हैं, दरअसल वह लम्बी लड़ाई में हमारे खिलाफ खड़ा होने वाले चेहरे हैं. जयराम को इन तमाम सवालों के साथ ही कुड़मी राजनीति से अपने को अलग कर आदिवासी-मूलवासियों की संयुक्त लड़ाई पर फोकस करना होगा, और सबसे जरुरी चीज यह है कि सियासत में गर्म चाय को स्वाद लेना कई बार नुकसान दायक होता है,  हमें उसके संभावित परिणाम पर भी विचार करना होगा, कहीं हमारी आपस की लड़ाई में हमारे दुश्मनों का रास्ता साफ नहीं हो जाय, क्योंकि उसके बाद हमारी राजनीति तो किसी ना किसी रुप में चलती रहेगी, लेकिन आदिवासी-मूलवासी राजनीति का बंटाधार हो जायेगा. इसलिए कोई भी कदम उठाने के पहले हमें आदिवासी मूलवासी समाज के राजनीतिक शत्रुओं की ताकत और उनकी भावी रणनीति की बारकियों को समझना होगा. कहीं ऐसा नहीं हो जाये कि इस लड़ाई में आज जो भी मुट्ठी भर सियासी ताकत भी हमारे हाथ में है, इस जंग में वह भी हाथ से निकल जाये.


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