महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर, चाचा शरद को गच्चा दे भतीजे अजित ने थामा भाजपा का हाथ, बने उपमुख्यमंत्री

    महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर, चाचा शरद को गच्चा दे भतीजे अजित ने थामा भाजपा का हाथ, बने उपमुख्यमंत्री

    TNP DESK- महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से भूचाल आया है. पिछले कई महीनों से सियासी गलियारों में जारी अटकलों को विराम देते हुए रांकपा प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने भाजपा के साथ मिलकर एकनाथ शिंदे की सरकार में डिप्टी सीएम का पद स्वीकार कर लिया है. अजित पवार के साथ आठ विधायक भी शरद पवार का साथ छोड़ गये हैं, इन विधायकों में छगन भुजबल, धनजंय मुंडे, अनिल पाटिल, दिलीप वलसे पाटिल, धर्मराव अत्राम, सुनील वलसाड, अदिति तटकरे, हसन मुश्रीफ के नाम शामिल हैं. राज्यभवन में आयोजित एक समारोह आयोजित कर इन सभी को मंत्री पद की शपथ दिलवायी गयी.

    चाचा के इस्तीफे वापसी से नाराज थें अजित पवार

    यहां बता दें कि पिछले कुछ दिनों से अजित पवार का भाजपा से नजदीकियों की खबरें लगातार आ रही थी, दावा किया जा रहा था कि जिस प्रकार से शरद पवार ने अपना इस्तीफा सौंपा और बाद में उसे वापस ले लिया, अजित पवार उसे अपनी राजनीतिक दुकान को बंद करने की कवायद के बतौर पर देख रहे थें. 62 साल के हो चुके अजित पवार को यह लगने लगा था कि अपनी तमाम अस्वस्थताओं के बावजूद भी जिस प्रकार से शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति को हांक रहे हैं, राजनीति के तमाम डोर अपने हाथ में रखे हुए हैं, उसे देखते हुए उनका राजनीतिक भविष्य रांकपा में सुरक्षित नहीं रहने वाली है. चाचा शरद के साथ रहते हुए उन्हे अपनी स्वतंत्र राजनीति के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा.

    महाराष्ट्र् की राजनीति में सुप्रिया सिल्ले की बढ़ती सक्रियता से भी थी नाराजगी

    इसके साथ ही हालिया दिनों में शरद पवार अपनी बेटी सुप्रिया सिल्ले को लगातार महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय करते भी नजर आ रहे थें. महाराष्ट्र की राजनीति में सुप्रिया सिल्ले का बढ़ता दखल उन्हे रास नहीं आ रहा था, हालांकि बावजूद इसके अजित पवार बार बार अपनी नाराजगी की खबरों को  गलत बता रहे थें, साथ ही  चाचा शरद पवार के नेतृत्व में अपना विश्वास भी प्रकट कर रहे थें. हालांकि अजित पवार के इस कदम को सुप्रिया सिल्ले की भावी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, माना जा रहा है कि अजित पवार के रहते सुप्रिया सिल्ले की भूमिका बेहद सीमित हो होती जा रही थी. अब जबकि रांकपा से अजित  पवार की विदाई हो चुकी है, या यों कहें कि हालात को समझते हुए अजित पवार ने खुद ही अलविदा कहने का फैसला कर लिया, सुप्रिया सिल्ले की राह आसान हो गयी, शायद शरद पवार की राजनीति भी यही थी.

     


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