जमशेदपुर के इस शिव मंदिर में आज भी पाताल गंगा से होता है महादेव का जलाभिषेक, पढ़ें 250 साल पुराने रहस्यमयी मंदिर का इतिहास

    जमशेदपुर के इस शिव मंदिर में आज भी पाताल गंगा से होता है महादेव का जलाभिषेक, पढ़ें  250 साल पुराने रहस्यमयी मंदिर का इतिहास

    टीएनपी डेस्क(TNP DESK): हमारे देश में देवी-देवताओं के कई ऐसे मंदिर हैं, जिनकी पुरानी सभ्यता और धार्मिक महत्व है.वहीं यदि हम झारखंड की बात करें, तो झारखंड में भी कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जिनकी धार्मिक आस्था और संस्कृति बहुत ही पुरानी है. जिसको जानकर आप हैरान हो जाते हैं. चाहे वो देवघर का बाबा मंदिर हो या फिर रामगढ़ का छिनमस्तिका मंदिर. वहीं यदि हम लौहनगरी जमशेदपुर की बात करें तो यहां भी कई प्रसिद्ध मंदिर है. पूर्वी सिंहभूम में भगवान शंकर का एक ऐसा चमत्कारी मंदिर है, जो करीब ढ़ाई सौ साल पुराना है, और यहां आज भी पाताल गंगा से भोलेनाथ का जलाभिषेक होता है, तो चलिए जानते है इस मंदिर का इतिहास क्या है.

    पुर्वी सिंहभूम जिले के साधुडेरा गांव में स्थित है मंदिर

    आपको बताये कि महादेव शंकर का यह चमत्कारी मंदिर पुर्वी सिंहभूम जिले के हाथीबिंदा पंचायत के साधुडेरा गांव में स्थित है. जिसका नाम कालेश्वर मंदिर है. यह मंदिर का इतिहास करीब 250 साल पुराना है.मंदिर कई रोचक और अदभुत बातों के लिए जाना जाता है. पाताल गंगा से महादेव का जलाभिषेक आज के जमाने में सुनने में काफी अटपटा लगता है, लेकिन जमशेदपुर के आसनबनी में स्थित इस मंदिर से काफी भक्तों की आस्था जुड़ी है, जो इसे सच मानते है.

    देश का ऐसा पहला मंदिर जहां जोड़े शिवलिंग की होती है पूजा

    इस रहस्यमयी प्राचीन मंदिर का एक रोचक इतिहास है. कालेश्वर मंदिर में जोड़ा शिवलिंग की पूजा की जाती है. एक मंदिर में दो शिवलिंग, किसी भी महादेव के मंदिर में नहीं देखने को मिलता है, लेकिन लोग बताते हैं कि यहां दो शिवलिंग एक साथ स्वयं ही जागृत हुई थी जिसके बाद से लोग इसकी पूजा करने लगे.

    इस तरह मंदिर तक पहुंच  सकते है आप

    जमशेदपुर शहर से इस मंदिर की दूरी करीब 15 किलोमीटर है. यदि आप यहां जाना चाहते है, तो इसके लिए सबसे पहले आपको गोविंदपुर रेलवे फाटक से खैरबनी होते हुए आसनबनी के रास्ते करीब 4 किलोमीटर दूर साधुडेरा गांव पहुंचना होगा.आसनबनी रेलवे स्टेशन से इस मंदिर की दूरी लगभग 1.5 किलोमीटर है. मंदिर तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक वाहन की सुविधा उपलब्ध नहीं है.हालांकि मंदिर तक जाने के लिए आपको पक्की सड़क मिल जायेगी है लेकिन ये इलाका काफी सूदूर और दुर्गम है.

    100 साल पहले हुआ था मंदिर का निर्माण

    वैसे तो इस मंदिर में जो शिवलिंग स्थापित है, उसकी खोज 250 साल पहले ही हो गई थी, लेकिन मंदिर को आज से सौ साल पहले ही बनाया गया था. मंदिर निर्माण को लेकर एक कथा प्रचलित है जिसके मुताबिक 100 साल पहले जब हावड़ा मुंबई रेल लाइन बिछाने का काम शुरु हुआ, तो रेलवे लाइन बिछानेवाली कंपनी के ठेकेदार ने भगवान भोलेनाथ से मन्नत मांगा था कि बिना किसी रोक के रेलवे लाईन बिछाने का काम पूरा हो जायेगा, तो वो मंदिर का निर्माण करवायेगा.जब काम पूरा हुआ तो ठीकेदार ने कालेश्वर मंदिर बनवाया.

    प्रचंड गर्मी में भी नहीं सूखता है कुएं का पानी

    मंदिर के बारे में सबसे अनोखी बात यह है कि आज भी यहां पाताल गंगा के जल में जोड़ा शिवलिंग पर जलाभिषेक होता है. ग्रामीण इसे गुप्त गंगा भी कहते हैं जहां महज 3 फुट गहरे कुएं से लगातार पानी बहता रहता है.लगातार पानी बहने की वजह से यहां एक तालाब बन गया है.आपको बताये कि इस शिवलिंग की खोज राम लखन नाम के साधु ने की थी. जिसके बाद आस पास  के गांव वाले भी पूजा करने लगे.बुर्रा नदी के किनारे स्थित इस मंदिर में वैसे तो सालों भर पूजा होती है, लेकिन सावन और शिवरात्रि में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है,जहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. मंदिर के बारे में एक हैरान करनेवाली बात यह भी है कि प्रचंड गर्मी के बाद भी इस कुएं का पानी कभी भी नहीं सूखता है और इस कुएं का निर्माण भी किसी ने नहीं करवाया था.


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