जब प्रह्लाद की अटूट भक्ति के आगे हार गई होलिका, पढ़ें होलिका दहन की ऐतिहासिक और धार्मिक वजह

    जब प्रह्लाद की अटूट भक्ति के आगे हार गई होलिका, पढ़ें होलिका दहन की ऐतिहासिक और धार्मिक वजह

    टीएनपी डेस्क(TNP DESK):होली का रंग त्यौहार उत्साह और आपसी भाईचारे का त्यौहार है जिसको लोग पुरे परिवार समाज आस पड़ोस के साथ मिलकर मनाते है.लेकिन हर साल होली से पहले होलिका दहन की एक पौराणिक परंपरा है जहां लोग ढेर सारी लकड़ियां जमाकर करके पूजा पाठ कर होलिका दहन करते है.होली एक ऐसा त्यौहार है जिसको असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मनाया जाता है.ऐसे में सभी के मन में सवाल उठता है कि आखिर होली से पहले होलिका दहन क्यों किया जाता है इसके पीछे हिंदू पौराणिक परंपरा क्या है चलिए आज हम आपको इसका सही जवाब देते है.

    हर साल होली से एक दिन पहले जलाई जाती है होलिका 

    आपको बता दें कि हर साल होली से एक दिन पहले होलिका दहन की परंपरा है जिसको अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से जाना जा सकता है यूपी बिहार और झारखंड में इसे होलिका दहन या अगजा के नाम से जाना जाता है.ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर कब से होलिका दहन की पौराणिक परंपरा चली आ रही है इसकी शुरुआत कैसी हुई थी. इसके पीछे की वजह क्या है तो चलिए आज हम आपको इसकी पूरी पौराणिक कथा के बारे में बताते है.आखिर कब से और क्यों होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई.

    पढ़े क्या होलिका दहन की पौराणिक कथा

    होलिका दहन के पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में प्रह्लाद नाम का बालक भगवान विष्णु का परम भक्त था हालांकी उसके पिता हिरणकश्यप राक्षस कुल का था जिसको कभी भी पूजा पाठ मंजूर नहीं था, वह चाहता था कि उसकी तरह ही उसकी पुत्र प्रह्लाद असुर कुल के बड़े राजा बने और लोगों पर अत्याचार करें लेकिन भक्त प्रह्लाद को यह बिल्कुल मंजूर नहीं था वह हमेशा भगवान की भक्ति में लिन रहते थे वही हिरनकश्यप को पूजा-पाठ करने वाले लोग बिल्कुल भी पसंद नहीं थे, जो भी उनके राज्य में पूजा पाठ करता था उसको जान से मार देता था. हलांकि उसका खुद का ही बेटा 24 घंटे भगवान की भक्ति में लीन रहता था.कई बार उसने अपने बेटे प्रह्लाद को भी पूजा-पाठ करने और भक्ति करने से मना किया लेकिन प्रह्लाद नहीं माने जिससे परेशान होकर हिरणकश्यप ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि प्रह्लाद को जान से मार दे.सैनिको ने भक्त प्रह्लाद को हाथी के पैरो के नीचे फेंक दिया लेकिन फिर भी हाथी का पैर प्रह्लाद पर नहीं पड़ा बार-बार कोशिश करने की बावजूद भक्त प्रह्लाद बच जाते थे इससे परेशान होकर हिरण कश्यप ने अपनी बहन से मदद लेने की सोची जिसका नाम होलिका  था.

     भगवान की भक्ति के आगे हर गई थी होलिका 

    दरअसल हिरण कश्यप की बहन होलिका के पास एक ऐसा चादर था जिसे ओढ़ लेने के बाद आप आग पर बैठ जाएं तब भी आप नहीं जल सकते है दोनों भाई बहन ने मिलकर भक्त प्रह्लाद को आग में जलाने की योजना बनाई.होलिका छोटे भक्त प्रह्लाद को लेकर जलती हुई धधकती आग पर बैठ गई खुद तो साल ओढ़ लिया जिससे वह नहीं जल पाती लेकिन भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठ गई.जैसी ही वह आग पर लेकर भक्त प्रल्हाद को बैठाया भगवान विष्णु ने होलिका को ही जला कर भस्म कर दिया और भक्त प्रहलाद जिंदा बच गए.इस दिन से प्रेरित होकर हर साल होलिका से पहले होली दहन की परंपरा निभाई जाती है.

    साल 2026 में कब होगा होलिका दहन

    वही साल 2026 में होली की बात की जाए तो 4 मार्च को होली मनाई जाएगी वहीं 2 मार्च को होली का दहन किया जाएगा हलांकि होलिका दहन होली से एक दिन पहले किया जाता है लेकिन चंद्र ग्रहण लगने की वजह से 2 दिन पहले ही होलिका दहन कर दिया जाएगा.


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