कचड़ा किसका?  पूर्व सीएम रघुवर दास या हेमंत सोरेन की सरकार का, बाबूलाल के ट्विट से उभरते सवाल

    कचड़ा किसका?  पूर्व सीएम रघुवर दास या हेमंत सोरेन की सरकार का, बाबूलाल के ट्विट से उभरते सवाल
    मोरल ऑफ स्टोरी यह है कि ये नवरत्न किसी पार्टी के नहीं होकर झारखंड की सत्ता के हैं, और इनके बगैर किसी की सत्ता झारखंड में नहीं चलती. इनका राजनीतिक प्रताप हर शासन मे बोलता है, हेमंत सोरोन की सरकार भी इसका अपवाद नहीं है. हां, एक बात  सत्य है कि रघुवर शासन काल की तरह हेमंत सोरेन की सरकार को ईडी और सीबीआई का सुरक्षा कवच प्राप्त नहीं है. लेकिन यह मत भूलिये, देश के हालात  अब बदल रहे हैं,

    रांची(RANCHI)- बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागार में निलंबित आईएएस छवि रंजन और राजनीतिक गलियारों में सत्ता के दलाल के रुप में अपनी पहचान रखने वाले प्रेम प्रकाश के बीच कथित रुप से गुपचुप मुलाकात पर पूर्व सीएम बाबूलाल ने ट्विट कर कई सारे प्रश्न खड़े किये हैं.

    मुख्यमंत्री लूट मंडली के ये सितारे किसके?

    उन्होंने लिखा है कि एक तरफ पंकज मिश्रा अपनी गिरफ्तारी के बाद रिम्स से सरकार चलाने की कोशिश करता है, उसकी गिरफ्तारी के साथ ही राज्य के आला अधिकारियों की पूरी टीम और पुलिस प्रशासन का फौज उसके सामने हाजरी लगाने के लिए रिम्स की दौड़ लगाने लगता हैं, तो दूसरी तरफ बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागार में सुपर दलाल प्रेम प्रकाश सेना जमीन घोटाले में जेल में बंद निलंबित आईएएस छवि रंजन से रात के अंधेरे में मुलाकात कर जेल मैनुअल की ऐसी-तैसी करता है. मुख्यमंत्री लूट मंडली के ये सारे सितारे एक से बढ़कर एक कारनामें कर रहे हैं, और हमारे “होनहार मुख्यमंत्री” इस सब अंजान बन टुकूर-टुकूर देख रहे हैं.

    कचड़ा साफ़ हो रहा है, लेकिन किसका?

    बाबूलाल आगे लिखते हैं कि संतोष बस इस बात की है कि जिन कुछ चोर, बेईमान, लुटेरों को आप (सीएम हेमंत) कुछ नहीं करते वे सभी “प्रेम के लूट जाल” में फँस कर बारी-बारी से जेल जा रहे हैं और आगे भी न जाने कितने जायेंगे. इससे जो कचड़ा साफ़ हो रहा है उससे झारखंड का कुछ तो भला हो ही जायेगा.

     

    आम आदमी की पीड़ा या राजनीतिक का दोहरापन?

    पहली नजर में बाबूलाल यह ट्विट झारखंड में बजबजाती भ्रष्टाचार की नली के विरुद्ध एक आम आदमी की पीड़ा नजर आती है, लेकिन अगले ही क्षण कई सवाल जेहन में कौंधने लगते हैं. पहला सवाल तो यही उठता है कि पूजा सिंघल से लेकर प्रेम प्रकाश, वीरेन्द्र पासवान से लेकर विशाल चौधऱी, और भी सारे नवरत्नों के कारनामें जिसकी चर्चा आज बाबूलाल कर रहे हैं, इनके सितारे किसके कार्यकाल में चमकें? क्या यह सच नहीं है कि पूजा सिंघल के द्वारा मनरेगा लूट की शुरुआत रघुवर शासन में हुई थी? और क्या यह सत्य नहीं है कि जिस पल्स हॉस्पिटल को आज भ्रष्टाचार का मंदिर बताया जा रहा है, उसका निर्माण उसी रघवुर शासन काल में हुआ था? सवाल यह भी उठता है कि तब बाबूलाल मरांडी का यह जमीर क्यों नहीं जागा?  क्या यह सत्य नहीं है कि रघुवर शासन काल में ही पूजा सिंघल के सभी आरोपों की फाइल को ठंडे बस्ते में डाला गया था? इन सभी सवालों पर बाबूलाल की चयनात्मक चुपी क्या इशारा करती है?

    रघुवर शासन में भी बजता था इन चेहरों का डंका

    आज जिस विशाल चौधरी और प्रेम प्रकाश को बाबूलाल हेमंत सोरेन के “मुख्य़मंत्री लूट मंडली” का नवरत्न बता रहे हैं, रघुवर शासन काल में भी तो इन्ही चेहरों की तूती बोलती थी, क्या यह सत्य नहीं है कि झारखंड में सीएम के चेहरे तो बदलते रहे, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इन्ही चेहरों का जलवा कायम रहा?  क्या बाबूलाल मंराडी ने तब अपना मुंह खोला था, उस दौर का वह कोई अपना ट्विट को ही रिट्विट कर अपनी विश्वसनीयता को साबित कर दें.

    सत्ताधारी दल के नेताओं का तब भी लगता था जमघट

    जिस वीरेन्द्र राम को आज भ्रष्टाचार की मूर्ति बताया जा रहा है, जिसके भ्रष्टाचार को सीएम हेमंत से जोड़ कर दिखलाने की कोशिश की जा रही है, क्या यह सही नहीं है कि रघुवर शासन काल में भी उसकी तूती बोलती थी?  क्या यह सही नहीं है कि उसी शासन काल में बीरेन्द्र राम की पत्नी के द्वारा राजधानी रांची के बड़े-बड़े होटलों में भव्य पार्टियों का आयोजन किया जाता था, जिसमें तब के सत्ताधारी दल से जुड़े नेताओं का जमघट लगता था, और तो और कभी उसी भाजपा के कद्दावर नेता रहे सरयू राय का दावा है कि बीरेन्द्र राम की पत्नी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहती थी,  उपर से नीचे तक जेवरों से लैस होकर भाजपा से टिकट की जुगाड़ लगा रही थी और मजेदार बात यह है कि भाजपा की ओर से हरि झंडी भी मिल गयी थी, लेकिन एन वक्त पर उससे जुड़े मामले उजागर होने लगे, जिसके बाद भाजपा ने अपना पैर पीछे करना उचित समझा, लेकिन सवाल यह है कि तब उसके विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं की गयी?

    इन सारे भ्रष्टाचार को सीएम हेमंत के हिस्से में कैसे और क्यों लिख जाय?

    अब इस हालत में इन सारे भ्रष्टाचार को सीएम हेमंत के हिस्से में कैसे और क्यों लिख दिया जाय? क्या आज नैतिकता का सवाल खड़ा करने वाले बाबूलाल को इसका भी जवाब नहीं देना चाहिए? साफ है कि भ्रष्टाचार झारखंड की राजनीति का एक कटु सत्य है. झारखंड गठन के बाद से ही यह बेरोक टोक अनवरत बहती रही है, सीएम बदलने से इनकी ताकत में कभी कोई कमी नहीं आती, हां इसके आका बदल जाते हैं. जिसकी सरकार बनती है, ये सारे नवरत्न उसी के गुणगान में मग्न हो जाते है.

    मोरल ऑफ स्टोरी

    मोरल ऑफ स्टोरी यह है कि ये नवरत्न किसी पार्टी के नहीं होकर झारखंड की सत्ता के हैं, और इनके बगैर किसी की सत्ता झारखंड में नहीं चलती. इनका राजनीतिक प्रताप हर शासन मे बोलता है, हेमंत सोरोन की सरकार भी इसका अपवाद नहीं है. हां, एक बात  सत्य है कि रघुवर शासन काल की तरह हेमंत सोरेन की सरकार को ईडी और सीबीआई का सुरक्षा कवच प्राप्त नहीं है. लेकिन यह मत भूलिये, देश के हालात  अब बदल रहे हैं, कर्नाटक इसका जीता जागता उदाहरण है, आज जनता भष्टाचार के विरुद्ध ना सिर्फ खड़ी हो रही है, बल्कि उसको राजनीति का केन्द्र बिन्दू भी बना रही है, और हेमंत सरकार को इससे सबक लेने की जरुरत है.


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