टीएनपी डेस्क (TNP DESK): क्या आपने कभी सोचा है की ट्रेन की पटरियों पर नुकीलें पत्थर क्यों बिछाए जाते है? भारतीय रेलवे को देश की 'लाइफलाइन' कहे जाने वाले हर रोज करोड़ों लोग ट्रेन से अपने डेस्टिनेशन पहुंचते हैं. रेल यात्रा के दौरान हो या पटरी पार करते समय, अक्सर देखा होगा कि लोहे की पटरियों के बीच और आसपास हजारों-लाखों की संख्या में छोटे-छोटे नुकीले पत्थर बिछे होते हैं. लेकिन 99% लोगों पता ही नहीं होता की आखिर यह पत्थर क्यों बिछाए जाते है. तो आपको बता दें रेलवे की भाषा में इन पत्थरों को 'बलास्ट' (Ballast) या गिट्टी कहा जाता है.

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर पटरियों पर इन पत्थरों को बिछाने का असली मकसद क्या है? क्या ये सिर्फ सजावट के लिए हैं या इसके पीछे कोई गहरा वैज्ञानिक कारण है? आइए विस्तार से समझते हैं कि ये पत्थर रेलवे ट्रैक के लिए कितने जरूरी हैं.
रेलवे ट्रैक की बनावट
आमतौर पर हमें लगता है कि रेलवे ट्रैक सिर्फ लोहे की पटरियों से बना है, लेकिन ऐसा नहीं है. एक सुरक्षित रेलवे ट्रैक कई परतों (Layers) से मिलकर बनता है जिस पर ट्रेन के पहिये दौड़ते हैं. पटरी के नीचे लगे कंक्रीट के लंबे ब्लॉक, जो पटरियों को आपस में जोड़कर रखते हैं. बलास्ट के नीचे दो अलग-अलग परतों में विशेष रूप से तैयार की गई मिट्टी होती है. इन सभी परतों के कारण ही रेलवे ट्रैक आम जमीन से थोड़ा ऊंचाई पर दिखाई देता है.
नुकीले पत्थरों का ही इस्तेमाल क्यों?
ट्रैक पर बिछाए जाने वाले पत्थर बेहद खास होते हैं. ये नदी के किनारों पर मिलने वाले गोल पत्थर नहीं होते, बल्कि खदानों से तोड़े गए नुकीले और खुरदरे पत्थर होते हैं.
वैज्ञानिक कारण
अगर पटरी पर गोल पत्थरों का इस्तेमाल किया जाएगा, तो ट्रेन के गुजरते समय वे भारी वजन और कंपन के कारण एक-दूसरे पर फिसलने लगेंगे.
इससे पटरी अपनी जगह से हट सकती है और बड़ा हादसा हो सकता है. इसके विपरीत, नुकीले पत्थर आपस में एक मजबूत पकड़ (Interlocking) बना लेते हैं, जिससे वे भारी से भारी वजन पड़ने पर भी अपनी जगह से टस से मस नहीं होते.
गिट्टी बिछाने के मुख्य कारण और फायदे
रेलवे ट्रैक पर बलास्ट (गिट्टी) बिछाने के कई महत्वपूर्ण कारण हैं, जो ट्रेन की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करते हैं जैसे
लाखों किलो का वजन संभालना
एक औसत ट्रेन का वजन लगभग 10 लाख किलोग्राम (1000 टन) तक हो सकता है. जब इतनी भारी ट्रेन ट्रैक से गुजरती है, तो पूरा भार केवल लोहे की पटरी सहन नहीं कर सकती. लोहे की पटरी यह वजन कंक्रीट के स्लीपरों पर डालती है, और स्लीपर इस भार को पत्थरों (बलास्ट) में बांट देते हैं. इस प्रकार, ये पत्थर ट्रेन के भारी-भरकम वजन को पूरी जमीन पर फैलाकर ट्रैक को धंसने से बचाते हैं.
कंपन (Vibration) को कम करना
जब ट्रेन अत्यधिक गति से पटरी पर दौड़ती है, तो बहुत तेज कंपन और शोर पैदा होता है. यदि ट्रैक के नीचे पत्थर न हों, तो इस कंपन के कारण कंक्रीट के स्लीपर टूट सकते हैं या पटरियां फैल सकती हैं. ये पत्थर स्प्रिंग की तरह काम करते हैं और ट्रेन के गुजरते समय पैदा होने वाले कंपन को सोख लेते हैं.
स्लीपरों को स्थिर रखना
कंक्रीट के बने स्लीपरों का सीधा काम पटरियों को अपनी जगह पर मजबूती से जकड़े रखना है. पत्थरों की मौजूदगी के कारण ये स्लीपर तेज गति से आती ट्रेन के दबाव में भी आगे-पीछे या दाएं-बाएं नहीं खिसकते.
जल निकासी (Water Drainage) की बेहतर व्यवस्था
बारिश के मौसम में रेलवे ट्रैक पर पानी जमा होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है. यदि ट्रैक पर मिट्टी होगी, तो वह कीचड़ बन जाएगी और ट्रेन धंस सकती है. पत्थर होने के कारण बारिश का पानी तुरंत पटरियों के बीच से छनकर नीचे निकल जाता है और रेलवे लाइन पर जलभराव नहीं होता.
पेड़-पौधों को उगने से रोकना
अगर रेलवे ट्रैक पर सिर्फ मिट्टी छोड़ दी जाए, तो वहां झाड़ियां, घास और पेड़-पौधें उग आएंगे. इससे ट्रेन चलाने में बाधा आएगी. पत्थरों की मोटी परत के कारण ट्रैक पर धूप और मिट्टी का सीधा संपर्क टूट जाता है, जिससे वहां कोई भी वनस्पति नहीं उग पाती.

यानी अगली बार जब आप ट्रेन से सफर करें और खिड़की से बाहर इन पत्थरों को देखें, तो समझ जाइएगा कि ये कोई साधारण पत्थर नहीं हैं. ये अदृश्य रक्षक हैं जो दिन-रात, बिना रुके, देश की करोड़ों आबादी को सुरक्षित उनकी मंजिल तक पहुंचाने में भारतीय रेलवे की मदद कर रहे हैं.

