धनबाद(DHANBAD): देश के इस्पात उद्योग के लिए बीसीसीएल की यह खदान "संजीवनी" साबित हो सकती है. 62 लाख टन प्राइम कोकिंग कोल् भंडार वाली अमलाबाद भूमिगत खदान परियोजना अब जल्द शुरू की जा सकती है. सूत्रों के अनुसार इस खदान से अगले दो से तीन दशक तक कोयला निकाला जा सकता है. यहां से निकलने वाला वाशरी ग्रेड वन एवं ग्रेड 2 का कोकिंग कोयला स्टील उद्योगों की जरूरत को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. बताया जाता है कि बीसीसीएल के सीएमडी ने एक दिन पहले क्षेत्र का दौरा कर प्रगति की समीक्षा की और कार्यों को तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि राजस्व साझेदारी मॉडल के तहत इस परियोजना को निर्धारित समय सीमा में पूरा करना कंपनी की प्राथमिकता है. सीएमडी ने कई अन्य जगह का दौरा भी किया।
स्टील उद्योग को कोकिंग कोल् की पड़ती है जरुरत ---
दरअसल, उत्पादन लक्ष्य को पूरा करने के लिए बीसीसीएल मैनेजमेंट लगातार प्रयासरत है. स्टील उद्योग को प्राइम कोकिंग कोल की जरूरत होती है और इस खदान से निकला कोयला स्टील उद्योग को मदद कर सकता है. यह खदान धनबाद- बोकारो जिले के बॉर्डर पर मौजूद है. लंबे समय तक यह खदान बंद रही. सूत्रों के अनुसार इस खदान का इतिहास 100 साल से भी अधिक पुराना है. आजादी के पहले यह खदान करमचंद थापर ग्रुप के स्वामित्व में थी. राष्ट्रीयकरण के बाद इसका स्वामित्व भारत कोकिंग कोल् लिमिटेड को मिल गया. कोयला का उत्पादन चलता रहा लेकिन 2008 में सुरक्षा कारणों से इसे बीसीसीएल ने बंद कर दिया।
पिछले साल ही सेल की जीतपुर खदान हुई थी बंद ----
यहां यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि धनबाद में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) की एक पुरानी खदान पिछले साल बंद कर दी गई थी. 109 साल पुरानी खदान को बंद कर दिया गया. यह हालांकि 2024 में ही खदान बंद कर दी गई थी, लेकिन आवश्यक सेवाएं जारी थी. लेकिन 2025 में इसे बंद कर दिया गया. जीतपुर खदान के बारे में बताया जाता है कि 1916 में खदान खोली गई थी और 1920 से कोयले का उत्पादन शुरू हुआ था. स्टील के उत्पादन में कोकिंग कोयले की जरूरत होती है. ऐसे में बीसीसीएल के पास कोकिंग कोल् का भंडार है. इस वजह से स्टील उद्योग को कोयला देने के लिए बीसीसीएल पर भी दबाव है. ऐसे में अमला बाद कोलियरी सेल को भी मदद पहुंचा सकती हैं.

