बिहार में सम्राट युग की शुरुआत: क्यों नए मुख्यमंत्री को भाजपा के लिए माना जा रहा है जश्न भी है और जोखिम भी ?

    बिहार में सम्राट युग की शुरुआत: क्यों नए मुख्यमंत्री को भाजपा के लिए माना जा रहा है जश्न भी है और जोखिम भी ?

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK): बिहार को राजनीति की प्रयोगशाला भी कहा जाता है. नीतीश कुमार ने इन प्रयोगों को बखूबी आगे बढ़ाया, लेकिन अब सम्राट चौधरी के ऊपर बिहार का ताज है. यह अलग बात है कि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बन गए हैं, लेकिन उनके लिए जश्न और जोखिम दोनों साथ-साथ आया है. वह गठबंधन के नेता है. इसलिए जोखिम भी है. चुनाव सबसे अधिक सीट आने के बावजूद भाजपा ने नीतीश कुमार को सीएम बनाया और तभी से यह चर्चा चल रही थी कि वह बदले जा सकते हैं. जिसकी परिणीति 14 अप्रैल को सामने आई. मतलब कहा जा सकता है कि बिहार की सत्ता अब "यूथ ब्रिगेड" के हाथ में है. लालू यादव और नीतीश कुमार दोनों अब राजनीति से लगभग ओझल हो जाएंगे. लालू प्रसाद यादव तो स्वास्थ्य करने से राजनीति से दूर हैं, लेकिन नीतीश कुमार अभी सक्रिय है. लेकिन अब वह अभी सम्राट चौधरी को जिम्मेवारी देकर इससे मुक्त हो गए हैं. नीतीश कुमार की महीन राजनीति ने विपक्ष को सिर उठाने नहीं दिया लेकिन अब तेजश्वी यादव, प्रशांत किशोर नए ढंग की राजनीति की शुरुआत कर सकते हैं.  

    सम्राट चौधरी कभी नीतीश कुमार का विरोधी हुआ करते थे लेकिन

    सम्राट चौधरी कभी नीतीश कुमार का विरोधी हुआ करते थे, लेकिन समय ने ऐसा पलटा खाया कि नीतीश कुमार ने ही अपनी कुर्सी सम्राट चौधरी को दे दी. सम्राट चौधरी के साथ ही बिहार में भाजपा को अपना पहला मुख्यमंत्री मिल गया है. नीतीश कुमार जब तक बिहार की राजनीति में रहे, भाजपा अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी. नीतीश कुमार की पार्टी से अधिक सीट मिलने के बावजूद नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहे. सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. सम्राट चौधरी के पिता कभी नीतीश कुमार की पार्टी तो कभी लालू प्रसाद की पार्टी में रहे. राजनीति में सम्राट चौधरी की एंट्री 1990 में हुई. 1999 में राबड़ी देवी की सरकार में कृषि मंत्री रहे.  

    सम्राट चौधरी 2000 में पहली बार राजद  के टिकट पर विधायक बने

    जानकार बताते हैं कि साल 2000 में वह पहली बार राजद के टिकट पर विधायक बने थे. यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार में नीतीश कुमार ने एक लम्बी लकीर खींच दी है. उसपर चलना या उसे आगे बढ़ाना बहुत आसान नहीं होगा. यह अलग बात है कि कालखंड के अनुसार बिहार की राजनीति में बदलाव आते रहा है. 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो कई उतार चढ़ाव और परिवर्तन के बावजूद वह 2026 के 14 अप्रैल तक मुख्यमंत्री रहे. अब कुशवाहा समाज की राजनीति करने वाले सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बन गए है. बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी कालखंड के अनुसार जातियों के हिसाब से बदलती रही है, कभी सवर्ण जातियों का दबदबा रहा तो कभी पिछड़े जमात के लोग भी सत्ता में रहे. 

    बिहार के लोग समय के अनुसार मुख्यमंत्री का चेहरा बदलते रहे हैं.

    उल्लेखनीय है कि बिहार के लोग समय के अनुसार मुख्यमंत्री का चेहरा बदलते रहे हैं. बिहार में शासन करने वाले कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश कुमार सबसे आगे रहे. बिहार में 19 साल से अधिक सीएम की कुर्सी पर रहने का रिकॉर्ड उनके नाम हो गया है. अगर थोड़ा पीछे लौटे तो आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में बिहार की कुर्सी पर सवर्ण जातियों का दबदबा था. 1990 के बाद पिछड़े और दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ा, बिहार की राजनीति में अलग-अलग जातियों का प्रभाव अलग-अलग समय में बढ़ा और घटा. सबसे अधिक मुख्यमंत्री की कुर्सी कुर्मी और भूमिहार जाति के नाम रही. कुर्मी समाज से आने वाले नीतीश कुमार 19 साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे. यह सबसे लंबा कार्यकाल कहा जाएगा. भूमिहार समाज से आने वाले श्रीकृष्णा सिंह 17 साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे. ब्राह्मण समाज से बिंदेश्वरी दुबे, विनोदानंद झा, केदार पांडे, भागवत झा आज़ाद और जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने. 1960 से लेकर 1980 के बीच कांग्रेस में ब्राह्मण जाति का प्रभाव था. राजपूत जाति से भी बिहार में चार मुख्यमंत्री बने, जिनमें चंद्रशेखर सिंह, सत्येंद्र नारायण सिंह, हरिहर सिंह और दीप नारायण सिंह के नाम गिनाये जाते हैं. हालांकि इनका कार्यकाल छोटा था.

    1990 के बाद तेजी से बदली बिहार की राजनीति 

    1990 के बाद बिहार की राजनीति में बदलाव आया. यादव समाज का प्रभाव तेजी से आगे गया. लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी ने मिलकर लगभग 14 साल तक बिहार की सत्ता संभाली, इसके अलावा दरोगा प्रसाद राय, बीपी मंडल भी यादव समाज से ही मुख्यमंत्री बने. माना जाता है कि 1990 के बाद 2005 तक का दौरा परिवर्तन का दौर था. दलित समाज से भी बिहार के कई लोग मुख्यमंत्री बने. भोला पासवान शास्त्री, रामसुंदर दास, जीतन राम मांझी का नाम लिया जाता है. हालांकि इनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा. इसके अलावे कर्पूरी ठाकुर भी बिहार के मुख्यमंत्री बने. पिछड़े वर्ग की राजनीति को मजबूत करने में उनकी भी बड़ी भूमिका मानी जाती है. लालू प्रसाद के पहले कर्पूरी ठाकुर ने ही पिछड़े वर्ग को मजबूती देने का प्रयास किया था. आंकड़ों के हिसाब से अगर देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि बिहार में जाति की राजनीति समय और काल के साथ बदलती रही. बिहार ने सभी जातियों के साथ यथासंभव "न्याय" किया. यह अलग बात है कि बिहार के इतिहास में कुर्मी जाति का शासन यानी नीतीश कुमार का शासन सबसे लंबा रहा. नीतीश कुमार के बाद अगला मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी बने है. वह कुशवाहा समाज की राजनीति से सीएम की कुर्सी तक पहुंचे हैं. 

    रिपोर्ट-धनबाद ब्यूरो


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