झारखंड का नाम आखिर क्यों पड़ा झारखंड? जानिए इसका गौरवशाली इतिहास और महत्व

    झारखंड का नाम आखिर क्यों पड़ा झारखंड? जानिए इसका गौरवशाली इतिहास और महत्व

     टीनपी डेस्क (TNP DESK):  झारखंड अपने इतिहास, जल, जंगल, जमीन और आदिवासी संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. झारखंड 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर अपना राज्य बना और देश के 28वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया. यह भूभाग दिखने में जितना सुंदर है, इसका इतिहास उतना ही गौरवशाली और प्राचीन है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस राज्य का नाम 'झारखंड' ही क्यों पड़ा? इसका इतिहास कितना पुराना है और प्राचीन ग्रंथों में इसे किस नाम से पुकारा जाता था? आइए, झारखंड के नामकरण, इसके हजारों साल पुराने इतिहास और इसकी प्राचीनता को विस्तार से समझते हैं.

    क्यों पड़ा इसका नाम 'झारखंड'?

    झारखंड शब्द दो शब्दों के मेल से बना है, 'झार' (झाड़) और 'खण्ड'. झार/झाड़ जिसका अर्थ होता है वन, जंगल, झाड़ियां या पेड़-पौधे. वहीं खण्ड का अर्थ होता है टुकड़ा, भूमि या प्रदेश. इस प्रकार 'झारखंड' का सीधा और सरल अर्थ है  'वनों का प्रदेश' या 'जंगल का. चूंकि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही घने जंगलों, प्राकृतिक पहाड़ियों, पठारों और वनस्पतियों से घिरा रहा है, इसलिए भौगोलिक विशेषता के आधार पर इस पूरे क्षेत्र का नाम झारखंड पड़ा. यहाँ की मुख्य पहचान यहाँ के शाल, पलाश और महुआ के जंगल हैं, जो सदियों से इस धरती को हरा-भरा रखे हुए हैं.

    क्या है झारखंड का इतिहास ?

    अगर बात करें झारखंड के इतिहास की तो इसका इतिहास केवल कुछ सौ या हजार साल पुराना नहीं है, बल्कि यह पाषाण काल (Stone Age) जितना पुराना है. भू-वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के अनुसार, छोटानागपुर पठार (Chhotanagpur Plateau) भारत के सबसे प्राचीन भूभागों में से एक है.

    • प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Era): झारखंड के हजारीबाग, गढ़वा, रांची और सिंहभूम जिलों में पुरातत्व विभाग को प्रागैतिहासिक काल के कई साक्ष्य मिले हैं. हजारीबाग के 'इस्को' (ISKO) नामक स्थान पर पत्थरों को काटकर बनाई गई बेहद प्राचीन गुफाएं मिली हैं, जिन पर आदिमानव द्वारा बनाए गए शैलचित्र (Rock Paintings) आज भी मौजूद हैं. ये चित्र दर्शाते हैं कि यहाँ हजारों साल पहले भी मानव सभ्यता फल-फूल रही थी.
    • लौह और कांस्य युग: इतिहासकारों का मानना है कि असुर जनजाति, जो झारखंड की सबसे प्राचीन जनजातियों में से एक है, ने ही सबसे पहले इस क्षेत्र में लोहा गलाने की तकनीक विकसित की थी. यहाँ से बना लोहा सुदूर मेसोपोटामिया और मिस्र तक भेजा जाता था.

    प्राचीन ग्रंथों में झारखंड के विभिन्न नाम

    झारखंड का जिक्र भारत के सबसे प्राचीन धार्मिक और साहित्यिक ग्रंथों में मिलता है. हालांकि, अलग-अलग कालखंडों में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा गया:

    1. ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद का भाग): इस प्राचीन ग्रंथ में झारखंड क्षेत्र का सबसे पहला साहित्यिक उल्लेख मिलता है, जहाँ इस भूभाग को 'पुण्ड्र' या 'पुण्ड्र देश' कहा गया है.
    2. महाभारत काल: महाभारत के दिग्विजय पर्व में इस क्षेत्र का वर्णन मिलता है. उस समय इस क्षेत्र को 'पुण्डरीक देश' या 'पशुभूमि' (पशुओं की अधिकता के कारण) कहा जाता था. जरासंध के शासनकाल में भी इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व था.
    3. समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति: गुप्त वंश के प्रतापी राजा समुद्रगुप्त के शिलालेखों में इस क्षेत्र को 'मुरुण्ड देश' के नाम से संबोधित किया गया है.
    4. भागवत पुराण और वायु पुराण: भागवत पुराण में इसे 'किकट प्रदेश' और वायु पुराण में 'मुरंड' कहा गया है.

    'झारखंड' शब्द का पहला आधिकारिक प्रयोग

    अब सवाल उठता है कि इस पूरे क्षेत्र के लिए 'झारखंड' शब्द का प्रयोग सबसे पहले कब शुरू हुआ? इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि 13वीं शताब्दी के एक ताम्रपत्र (Copper Plate) पर सबसे पहले 'झारखंड' शब्द लिखा हुआ पाया गया था. यह ताम्रपत्र ओड़िशा के राजा नरसिंहदेव द्वितीय के समय का है.

    इसके बाद मध्यकाल में मुस्लिम इतिहासकारों, सूफी संतों और कवियों ने इस क्षेत्र के लिए 'झारखंड' शब्द का खुलकर इस्तेमाल किया:

    • महान सूफी संत कबीरदास के दोहों में भी झारखंड का जिक्र आता है: "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ... कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर, जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर... कबीरदास को झारखंड भेजा गया..."
    • मलिक मोहम्मद जायसी के प्रसिद्ध महाकाव्य 'पद्मावत' में भी इस क्षेत्र को झारखंड कहा गया है.
    • मुगल काल के दौरान आईन-ए-अकबरी और तुजुक-ए-जहांगीरी में इस क्षेत्र को 'कोकरा' या 'खंकाराह' भी कहा गया, क्योंकि यह क्षेत्र हीरों और सोने की नदियों (स्वर्णरेखा) के लिए प्रसिद्ध था.

    ब्रिटिश काल और आधुनिक आंदोलन

    अंग्रेजों के भारत आगमन के बाद झारखंड का इतिहास संघर्ष की नई गाथा बन गया. अंग्रेजों ने इस क्षेत्र को 'छोटानागपुर और संताल परगना' के नाम से प्रशासनिक रूप से विभाजित किया. लेकिन यहाँ के आदिवासियों ने कभी भी अपनी जल, जंगल और जमीन पर बाहरी लोगों (दिखु) का कब्जा स्वीकार नहीं किया.

    यही कारण है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम से बहुत पहले ही झारखंड की धरती पर कई बड़े विद्रोह शुरू हो चुके थे:

    • तिलका मांझी का विद्रोह (1784): भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ तीर-धनुष से लड़ाई लड़ी.
    • कोल विद्रोह (1831-32) और भूमिज विद्रोह.
    • संताल हुल (1855): सिद्धो-कान्हू और चांद-भैरव के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ किया गया सबसे भीषण विद्रोह.
    • बिरसा मुंडा का उलगुलान (1895-1900): भगवान बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुआ यह आंदोलन आज भी झारखंड की अस्मिता का सबसे बड़ा प्रतीक है.

    20वीं सदी की शुरुआत में, जयपाल सिंह मुंडा जैसे दूरदर्शी नेताओं ने एक अलग 'झारखंड राज्य' की मांग को राजनीतिक रूप दिया, जो दशकों के लंबे संघर्ष और बलिदान के बाद आखिरकार 15 नवंबर 2000 (बिरसा मुंडा की जयंती) को सच साबित हुआ. झारखंड का इतिहास सिर्फ 26 साल पुराना नहीं है, बल्कि यह सृष्टि के शुरुआती मानव इतिहास जितना पुराना है. 'झारखंड' नाम केवल पेड़ों और झाड़ियों का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह यहाँ के निवासियों के स्वाभिमान, प्रकृति के प्रति उनके प्रेम और जंगलों को बचाने के लिए किए गए सदियों पुराने संघर्ष की अनकही कहानी है. यही वजह है कि आज भी यह राज्य अपनी अनूठी ऐतिहासिक विरासत के कारण पूरे भारत में एक विशेष स्थान रखता है.



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