टीनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड, ये नाम सुनकर जल जंगल जमीन का नारा खुद ही हमारे मन में आ जाता है. लेकिन क्या आपको पता है की झारखंड का असली मतलब है क्या, कहाँ से आया तो आपको बता दें, झारखंड का शाब्दिक अर्थ ही है 'झाड़' यानी जंगलों का प्रदेश है. यह भारत का एक ऐसा अनूठा राज्य है जिसकी पहचान यहां के आदिवासी समुदायों, उनकी संस्कृति, अनूठी परंपराओं और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए किए गए महान संघर्षों से होती है. अक्सर कई लोगों के मन में यह सवाल आता है और इंटरनेट पर लोग अक्सर खोजते हैं कि झारखंड में आदिवासियों की कुल कितनी जनजातियां हैं, उनका इतिहास क्या है और वे एक-दूसरे से कैसे अलग हैं. अगर आप भी झारखंड के जनजातीय इतिहास और उनके वर्गीकरण को विस्तार से समझना चाहते हैं, तो आप इन सारे सवालों के जवाब बेहद आसानी से समझ सकते है.
झारखंड में आदिवासियों की कुल कितनी जनजातियां हैं?
झारखंड में वर्तमान में आधिकारिक तौर पर 32 जनजातीय समूह (Tribal Groups) निवास करते हैं. हालांकि, समय-समय पर कुछ अन्य उप-जातियों को भी अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल करने के प्रशासनिक प्रस्ताव आते रहे हैं, लेकिन मुख्य और ऐतिहासिक रूप से इनकी संख्या 32 मानी जाती है.
इन 32 जनजातियों को भारतीय सरकार और मानवशास्त्रियों (Anthropologists) ने उनकी जनसंख्या, साक्षरता और जीवन स्तर के आधार पर मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया है:
क. मुख्य धारा की जनजातियां (Major Tribes)
इन जनजातियों की आबादी राज्य में सबसे अधिक है और ये सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से अधिक सक्रिय हैं. इनमें चार प्रमुख नाम शामिल हैं:
- संथाल (Santhal): यह झारखंड की सबसे बड़ी जनजातीय आबादी है, जो मुख्य रूप से संथाल परगना क्षेत्र (दुमका, देवघर, गोड्डा आदि) में निवास करती है.
- उरांव (Oraon): यह राज्य की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है, जो मुख्य रूप से छोटानागपुर संभाग में रहती है. इन्हें कुरुख भाषा के लिए जाना जाता है.
- मुंडा (Munda): यह तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है, जिनका इतिहास झारखंड के निर्माण और महान 'उलगुलान' आंदोलन से गहराई से जुड़ा है.
- हो (Ho): यह चौथी सबसे बड़ी आबादी है, जो मुख्य रूप से कोल्हान संभाग (चाईबासा, जमशेदपुर क्षेत्र) में केंद्रित है.
ख. आदिम जनजातियां (PVTGs - Particularly Vulnerable Tribal Groups)
झारखंड की कुल 32 जनजातियों में से 8 जनजातियों को 'आदिम जनजाति' का दर्जा दिया गया है. ये वे बेहद संवेदनशील समूह हैं जिनकी आबादी या तो स्थिर है या घट रही है, जिनकी साक्षरता दर भी बहुत कम है और जो आज भी आधुनिकता से दूर जंगलों, पहाड़ों पर अपनी प्राचीन पारंपरिक जीवन शैली (जैसे शिकार और कंदमूल इकट्ठा करना) पर निर्भर हैं.
इन 8 आदिम जनजातियों के नाम निम्नलिखित हैं:
- बिरहोर (Birhor)
- कोरवा (Korwa)
- असुर (Asur - जिन्हें भारत का सबसे प्राचीन लोहा गलाने वाला समुदाय माना जाता है)
- परहिया (Parhiya)
- सवर या हिल खड़िया (Sabar / Hill Kharia)
- बिरजिया (Birjia)
- सौरिया पहाड़िया (Souria Paharia)
- माल पहाड़िया (Mal Paharia)
इनके अलावा चेरो, खरवार, भूमिज, लोहरा, महाली, चिक बड़ाईक, गोंड, बेदिया, करमाली, गोड़ाइत, बाथुड़ी, किसान, बंजारा, बिंझिया, खोंड, कोल और कँवर जैसी अन्य जनजातियां भी झारखंड की सांस्कृतिक विविधता को पूरा करती हैं.
झारखंड के आदिवासी इतिहास की गौरवगाथा
झारखंड में आदिवासियों का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि यह भूभाग खुद है. मानवशास्त्रियों के अनुसार, यहां की कई जनजातियां (जैसे असुर और मुंडा) प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Era) से ही इस क्षेत्र में रह रही हैं. इनके इतिहास को हम तीन मुख्य चरणों में समझ सकते हैं:
- I. जंगलों को आबाद करने का काल (प्राचीन इतिहास)
झारखंड के आदिवासियों के पूर्वज जब इस क्षेत्र में आए, तब यह पूरा इलाका घने जंगलों और पहाड़ों से घिरा हुआ था. मुंडा, उरांव और संथाल जैसी जनजातियों ने अपने कड़े परिश्रम से जंगलों को साफ किया, जमीन को खेती के योग्य बनाया और गांवों की स्थापना की. इस व्यवस्था को 'खूंटकट्टी' (मुंडा समुदाय में) और 'भुईंहरी' (उरांव समुदाय में) कहा गया, जहां जमीन पर किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे कुनबे या गांव का सामूहिक अधिकार होता था. उन्होंने अपनी एक स्वशासन प्रणाली (Self-Governance System) विकसित की, जिसे 'पड़हा पंचायत' या 'मांझी परगना' व्यवस्था कहा जाता है, जहां राजा या जमींदार नहीं बल्कि समाज के लोग मिलकर फैसले लेते थे.
- II. मध्यकाल और बाहरी हस्तक्षेप
मुगल काल के दौरान इस क्षेत्र को 'कोकरा' या 'झारखंड' के नाम से जाना जाने लगा. शुरुआत में स्थानीय नागवंशी राजाओं और आदिवासियों के बीच एक सामंजस्य था, लेकिन धीरे-धीरे बाहरी लोगों (जिन्हें आदिवासी समाज में 'दिकू' कहा गया) का प्रवेश शुरू हुआ. ये बाहरी लोग व्यापारी, सूदखोर और जमींदार थे, जिन्होंने आदिवासियों की मासूमियत का फायदा उठाकर उनकी जमीनों पर कब्जा करना और उनका आर्थिक शोषण करना शुरू कर दिया.
III. ब्रिटिश शासन और महान जनजातीय विद्रोह (क्रांति का इतिहास)
जब अंग्रेजों ने झारखंड के जंगलों और जमीनों पर टैक्स (लगान) लगाना शुरू किया, तो आदिवासियों का सदियों पुराना स्वाभिमान और स्वतंत्रता खतरे में पड़ गई. अपनी माटी को बचाने के लिए झारखंड के आदिवासियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ देश के सबसे पहले और सबसे उग्र विद्रोह किए.
- तिलका मांझी का विद्रोह (1784): बाबा तिलका मांझी ने अंग्रेजों के खिलाफ तीर-धनुष से लड़ाई छेड़ी और वे देश के पहले स्वतंत्रता सेनानियों में से एक बने.
- संथाल हुल (1855): सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव के नेतृत्व में हजारों संथालों ने ब्रिटिश सेना की ईंट से ईंट बजा दी थी.
- बिरसा मुंडा का उलगुलान (1895-1900): भगवान बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया और अंग्रेजों के खिलाफ 'उलगुलान' (महाविद्रोह) का शंखनाद किया.
इन आंदोलनों का ही परिणाम था कि ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए सीएनटी एक्ट (1908) और एसपीटी एक्ट (1949) जैसे कड़े कानून बनाने पड़े, जो आज भी झारखंड के आदिवासियों का सबसे बड़ा कानूनी सुरक्षा कवच हैं.
झारखंड की 32 जनजातियां सिर्फ एक आबादी का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे इस राज्य की ऐतिहासिक पहचान, जल-जंगल-जमीन के संघर्ष और सांस्कृतिक विरासत की संवाहक हैं. आदिम काल से लेकर आधुनिक काल तक, अपनी पहचान और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने का इनका इतिहास बेहद प्रेरणादायक है. आज के समय में जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब झारखंड के आदिवासियों की प्रकृति की पूजा करने की परंपरा (जैसे सरहुल और कर्मा त्योहार) और जल-जंगल के साथ तालमेल बिठाकर जीने की कला पूरी मानवता को एक नई राह दिखाती है. झारखंड को करीब से जानने के लिए यहां की जनजातियों के इस गौरवशाली इतिहास को समझना बेहद जरूरी है.

