लौहनगरी के इस मंदिर में आज भी माता पाषाण रुप में करती है निवास,पढ़ें रंकिणी मंदिर से जुड़ा रोचक इतिहास  

    लौहनगरी के इस मंदिर में आज भी माता पाषाण रुप में करती है निवास,पढ़ें रंकिणी मंदिर से जुड़ा रोचक इतिहास  

    टीएनपी डेस्क(TNP DESK):झारखंड में सैकड़ो धार्मिक तीर्थ स्थान है जिसकी महिमा और इतिहास काफी रोचक और दिलचस्प है. झारखंड में रांची का पहाड़ी मंदिर, जमशेदपुर का गोल पहाड़ी मंदिर या दलमा पहाड़ इन सभी के बारे में तो लोग जानते होंगे लेकिन आज हम आपको जमशेदपुर के कदमा स्थित एक ऐसे तीर्थ स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी महिमा काफी प्रसिद्ध है. इस मंदिर का नाम रंकिणी मंदिर है, जहां माता एक शीला के रूप में निवास करती हैं. आज हम आपके यहां से जुड़े पुराने इतिहास की कहानी को बताएंगे और यह भी बताएंगे कि यहां कब से पूजा की जा रही है.  

    आस्था का केंद्र है जादुगोड़ा का ये मंदिर

     माता रंकिणी का यह ऐतिहासिक मंदर जमशेदपुर शहर से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जादूगोड़ा के पहाड़ और घने जंगलों में के बीच है, जहां माता आज भी पाषाण  रुप में विराजमान है, वहीं आज भी जागृत है. जमशेदपुर के साथ राज्य के बाहर के लोगों के लिए भी मंदिर आस्था का केंद्र है, यहां रोजाना दूर झारखंड के साथ अलग-अलग राज्य से भक्त माता के दर्शन करने आते हैं. यहां की मान्यता है कि कोई भी भक्त लाल चुनरी में नारियल बांधकर अपनी मन्नत को मांगता हैं, तो माता उसकी मनोकामना जरुर पूरी करती है. 

    पढ़ें रंकिणी मंदिर से जुड़ी ये कहानी 

    इस मंदिर से जुड़ी कथा की माने तो एक बार माता रंकिणी दीनबंधू सिंह नाम के एक व्यक्ति के सपने में आयीं और अपने पाषाण रूप में होने का होने की बात कही, और यह भी कहा कि आज के बाद वह माता की रोजाना पूजा करें. माता के सपना दिखाने के बाद दीनबंधु सिंह रोजाना वहां जाकर माता के पाषाण रूप की पूजा करने लगे. फिर एक दिन माता ने दिव्य स्वप्न में आकर दीनबंधु से कहा कि वह हमेशा अकेले ही माता की पूजा करते हैं, लेकिन यदि वह उन्हें दूसरे स्थान पर स्थापित कर दें, तो पूरे जनमानस को माता के दर्शन हो पाएंगे और उनका आशीर्वाद प्राप्त हो पाएगा. दिन बंधु ने बिल्कुल ऐसा ही किया और माता की स्थापना वहां से हटकर ऐसे जगह पर कर दी, जहां आज माता का मंदिर विराजमान है. 

    लोगों का कहना है कि माता जिस पाषाण में निवास करती है वो रोजाना बढ़ रहा है

     माता रानी के मंदिर के इतिहास की बात की जाए तो यहां से जुड़ी एक कथा काफी प्रचलित है जिसके अनुसार माता आज भी पाषाण रूप में विराजमान है और यहां जागृत भी हैं. माता जिस पाषाण में निवास करती है, वो दिनो दिन बढ़ता जा रहा है. इस मंदिर की स्थापना 1947 और 50 के बीच की गई थी अभी जिस स्थान पर मंदिर की स्थापना की गई है वहां से मुख्य द्वार से नीचे गुजरने वाले नाला के बगल से कपाट घाटी में माता आज निवास करती हैं .

     मान्यता है कि बिना प्रणाम किये वाहन लेकर पार होने पर हो जाती है दुर्घटना 

    यहां की मान्यता बहुत ही प्रचलित है जिसके अनुसार कहा जाता है कि यहां एक ब्रिज हुआ करता था जिसे लोग पार किया करते थे, आज भी यहां वाहनों की विशेष पूजा की जाती है, कहा जाता है कि जो भी वाहन चालक माता को बिना प्रणाम किये यहां से पार होते है, तो उनका एक्सीडेंट हो जाता है.  .   


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