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सिंधु जल समझौता फिर सुर्खियों में,UN में पाकिस्तान ने भारत को दी कड़ी चेतावनी,जानिए क्या कहा

Saumya Shukla
Saumya Shukla
Reporter | Copy Editor

टिएनपी डेस्क(TNP DESK): भारत और पाकिस्तान के बीच वैसे तो कई मुद्दों को लेकर लंबे समय से खींचतान चलती रही है, लेकिन इस बार मामला पानी का है. पानी भी ऐसा, जिस पर दोनों देशों के बीच करीब छह दशक पहले एक समझौता हुआ था. इसे सिंधु जल समझौता कहा जाता है. अब यही समझौता फिर से चर्चा में है और मामला संयुक्त राष्ट्र यानी UN तक पहुंच गया है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में भारत को लेकर काफी सख्त बयान दिया. उन्होंने कहा कि अगर पाकिस्तान के हिस्से के सिंधु नदी के पानी को रोकने, उसमें रुकावट डालने या उसका रास्ता बदलने की कोशिश की गई तो पाकिस्तान इसे युद्ध की कार्रवाई मानेगा.

अब सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पानी के बंटवारे का करीब 66 साल पुराना समझौता एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के बीच बड़े विवाद का कारण बन गया?

पहले समझिए, क्या है सिंधु जल समझौता?

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता 19 सितंबर 1960 को हुआ था. इसे विश्व बैंक की मदद से तैयार किया गया था. संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड में भी यह समझौता दर्ज है.

इस समझौते में सिंधु नदी तंत्र की छह नदियों के पानी को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गईं. आसान भाषा में समझें तो रावी, ब्यास और सतलुज को पूर्वी नदियां माना गया और इनके पानी के इस्तेमाल का अधिकार मुख्य रूप से भारत को मिला.

वहीं सिंधु, झेलम और चिनाब पश्चिमी नदियां हैं. इनके पानी का मुख्य इस्तेमाल पाकिस्तान के लिए तय किया गया. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत इन नदियों के पानी को बिल्कुल इस्तेमाल नहीं कर सकता. समझौते में भारत को घरेलू जरूरतों और कुछ शर्तों के तहत बिजली बनाने जैसी परियोजनाओं के लिए पानी के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है.

यही व्यवस्था पिछले कई दशकों से दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे का आधार बनी हुई थी.

फिर अचानक विवाद क्यों बढ़ गया?

सिंधु जल समझौते को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेद पहले भी रहे हैं. भारत की कई जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान आपत्ति जताता रहा है. लेकिन अप्रैल 2025 के बाद मामला काफी ज्यादा गंभीर हो गया.

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में आतंकी हमला हुआ. इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कदम उठाए. इन्हीं कदमों में सिंधु जल समझौते को 'abeyance' यानी अगले फैसले तक रोककर रखने का फैसला भी शामिल था.

भारत का कहना है कि पाकिस्तान के साथ सामान्य रिश्तों और सहयोग के लिए भरोसे का माहौल जरूरी है. भारत ने सिंधु जल समझौते को लेकर अपना फैसला सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे से जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि मौजूदा परिस्थितियों में पहले जैसी व्यवस्था जारी रखना संभव नहीं है.

यहीं से पानी का मुद्दा सीधे भारत-पाकिस्तान के सुरक्षा और राजनीतिक विवाद से जुड़ गया.

पाकिस्तान इस फैसले का विरोध क्यों कर रहा है?

पाकिस्तान का कहना है कि भारत अकेले इस समझौते को रोक नहीं सकता. पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में भेजे अपने पत्रों में लगातार दावा किया है कि सिंधु जल समझौते में किसी एक पक्ष को इसे एकतरफा तरीके से निलंबित करने या 'abeyance' में रखने का अधिकार नहीं दिया गया है.

पाकिस्तान के लिए यह मामला इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि वहां खेती और सिंचाई का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी तंत्र पर निर्भर है. इसलिए पाकिस्तान इसे सिर्फ भारत-पाकिस्तान के बीच सामान्य विवाद के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे अपने लिए पानी और खेती से जुड़ा बड़ा मुद्दा मानता है.

UN में शहबाज शरीफ ने क्या कहा?

यही विवाद अब संयुक्त राष्ट्र महासभा तक पहुंच गया है. शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में कहा कि पाकिस्तान सिंधु नदी के पानी को अपने लोगों के लिए बेहद जरूरी मानता है.

उन्होंने भारत को चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकने, उसका प्रवाह बदलने या उसमें रुकावट डालने की कोशिश को पाकिस्तान युद्ध की कार्रवाई के तौर पर देखेगा. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भारत के सिंधु जल समझौते को 'abeyance' में रखने के फैसले के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाया.

यानी पाकिस्तान अब इस मुद्दे को सिर्फ दोनों देशों के बीच बातचीत तक सीमित नहीं रखना

अंतरराष्ट्रीय अदालत का मुद्दा भी जुड़ा है

सिंधु जल समझौते का विवाद सिर्फ UN तक सीमित नहीं है. इस मामले में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का मुद्दा भी सामने आया है.

पाकिस्तान ने समझौते से जुड़े कुछ विवादों को Permanent Court of Arbitration (PCA) के सामने उठाया है. पाकिस्तान इस प्रक्रिया और उससे जुड़े फैसलों का हवाला देते हुए कहता है कि समझौता अभी भी लागू है.

भारत ने हालांकि इस मध्यस्थता प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया और इसके अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं है.

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल सबसे बड़ी बात यह है कि भारत और पाकिस्तान दोनों की स्थिति इस मुद्दे पर काफी सख्त है. पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहा है, जबकि भारत अपने फैसले को आतंकवाद और दोनों देशों के बीच बिगड़े रिश्तों के संदर्भ में देख रहा है.

इसलिए सिंधु जल समझौते का विवाद अब सिर्फ पानी के बंटवारे का मामला नहीं रह गया है. इसके साथ सुरक्षा, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों का पूरा विवाद जुड़ चुका है.

एक बात जरूर साफ है कि 1960 में जिस समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच नदियों के पानी को लेकर विवाद कम करना था, आज वही समझौता दोनों देशों के बीच तनाव का एक बड़ा मुद्दा बन गया है. संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की ताजा चेतावनी ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में सिंधु जल समझौता भारत-पाकिस्तान संबंधों का बेहद अहम मुद्दा बना रहेगा.