टीएनपी डेस्क(TNP DESK): दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं भारतीय मूल की नवनीतम नवी पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है. पिल्लै ने अपनी जिंदगी मानवाधिकारों की रक्षा और न्याय के लिए लड़ते हुए बिताई है. वॉर क्राइम और जेनोसाइड करने वालों को सजा दिलाने से लेकर इंटरनेशनल लॉ को मजबूत करने तक, उन्होंने कई अहम काम किए हैं. नोबेल समिति का कहना है कि आज दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध चल रहे हैं. ऐसे में शांति बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हर देश कानून का सम्मान करे. जब कानून मजबूत होगा, तभी ताकतवर लोगों को भी उनके गलत कामों के लिए जवाबदेह बनाया जा सकेगा. पिल्लै को इसी दिशा में उनके प्रयासों के लिए सम्मानित किया जा रहा है.
नूर्नबर्ग की अदालत का किया जिक्र
पुरस्कार के ऐलान के बाद पिल्लै ने नूर्नबर्ग की अदालत का जिक्र किया. जर्मनी के इस शहर में सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद नाजी नेताओं के खिलाफ मुकदमे चलाए गए थे. 1945 और 1946 में हुई इन सुनवाइयों में युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ किए गए अपराधों पर कार्रवाई की गई थी.
पिल्लै के लिए यह अदालत इस बात का प्रतीक है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है. चाहे वह कितना ही ताकतवर क्यों न हो, अगर उसने अपराध किया है तो उसे जवाब देना होगा.
नोबेल समिति का फोन नहीं उठा पाईं पिल्लै
नोबेल पुरस्कार की घोषणा से पहले आम तौर पर समिति विजेता से फोन पर संपर्क करती है. लेकिन इस बार पिल्लै से बात नहीं हो पाई. इसके बाद समिति के अध्यक्ष योर्गेन वाट्ने फ्राइडनेस ने मजाकिया अंदाज में कहा कि नॉर्वे के नंबर से फोन आए, तो उसे उठा लीजिएगा. नॉर्वे का अंतरराष्ट्रीय फोन कोड +47 है.
समिति का कहना है कि इस पुरस्कार के जरिए दुनिया को यह याद दिलाना जरूरी है कि कानून का पालन सिर्फ आम लोगों के लिए नहीं, बल्कि हर देश और हर ताकतवर व्यक्ति के लिए जरूरी है. इससे विवादों को हिंसा के बजाय बातचीत और न्याय के रास्ते सुलझाने में मदद मिलती है.
मजदूर परिवार में हुआ जन्म
नवी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था. उनका परिवार तमिल भारतीय मूल का है. उनके दादा 1890 के दशक में भारत से बंधुआ मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका गए थे. वहां उन्हें गन्ने के खेतों में काम करना पड़ता था.
परिवार की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. एक हादसे में उनके दादा के दोनों हाथ चले गए. घर की आर्थिक हालत ऐसी थी कि उनके बेटे नारायणसामी नायडू को महज आठ साल की उम्र में पढ़ाई छोड़कर काम करना पड़ा. बाद में उन्होंने बस चलाकर परिवार का खर्च उठाया.
नवी पिल्लै आठ भाई-बहनों में पांचवें नंबर पर थीं. घर में पैसे की कमी थी, लेकिन उनके माता-पिता ने बच्चों को पढ़ाने की कोशिश जारी रखी.
एक ऐसे परिवार से निकलकर, जहां कभी गुजारा करना भी मुश्किल था, दुनिया में न्याय और मानवाधिकारों की आवाज बनने तक का उनका सफर आसान नहीं रहा. उनकी कहानी संघर्ष के साथ-साथ इस बात की भी मिसाल है कि बराबरी और न्याय के लिए लड़ाई जारी रखना कितना जरूरी है.