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भारत-पाकिस्तान की वो 5 ऐतिहासिक संधियां, जिन्होंने बदले रिश्तों के मायने

Saumya Shukla
Saumya Shukla
Senior News Publisher • TheNewsPost.in

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की कहानी सिर्फ युद्ध, सीमा विवाद और तनाव की नहीं है. 1947 में देश के बंटवारे के बाद दोनों देशों के बीच कई ऐसे समझौते हुए, जिनका मकसद तनाव कम करना और कुछ अहम मुद्दों पर सहमति बनाना था. इन समझौतों ने कभी शांति की उम्मीद जगाई, तो कभी दोनों देशों के बीच विवादों को संभालने का रास्ता दिखाया. हालांकि कई समझौते लंबे समय तक टिक नहीं पाए, लेकिन उनका असर आज भी भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में दिखाई देता है. आइए जानते हैं ऐसे ही पांच ऐतिहासिक समझौतों के बारे में.

नेहरू-लियाकत समझौता, 1950

1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद दोनों देशों में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. लाखों लोगों को अपना घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा. दोनों देशों में रहने वाले अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बन गई थी. इसी माहौल में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच अप्रैल 1950 में समझौता हुआ.

इस समझौते का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देना था. दोनों सरकारों ने अपने यहां रहने वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने और उन्हें बिना डर के रहने का भरोसा दिया. साथ ही जबरन धर्म परिवर्तन और लोगों को डराने-धमकाने जैसी घटनाओं को रोकने की बात भी कही गई.

यह समझौता इसलिए अहम था क्योंकि आजादी के तुरंत बाद दोनों देशों के बीच भरोसा काफी कमजोर था. ऐसे समय में दोनों सरकारों का साथ बैठकर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर सहमति बनाना एक बड़ा कदम माना गया.

सिंधु जल संधि, 1960

भारत और पाकिस्तान के बीच पानी का मुद्दा हमेशा बेहद संवेदनशील रहा है. इसी विवाद को सुलझाने के लिए 19 सितंबर 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए. विश्व बैंक ने भी इस समझौते को कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय किए गए. रावी, ब्यास और सतलुज का पानी मुख्य रूप से भारत के हिस्से में आया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी पर पाकिस्तान को प्रमुख अधिकार मिला. हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों के पानी का सीमित इस्तेमाल करने की अनुमति भी दी गई.

भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध और तनाव के बावजूद यह संधि लंबे समय तक दोनों देशों के बीच पानी से जुड़े विवादों को संभालने का आधार बनी रही. यही वजह है कि इसे दुनिया के महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों में गिना जाता है.

ताशकंद समझौता, 1966

1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की जरूरत महसूस हुई. सोवियत संघ की मध्यस्थता से दोनों देशों के नेताओं के बीच ताशकंद में बातचीत हुई.

10 जनवरी 1966 को भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए. दोनों देशों ने युद्ध के दौरान कब्जे वाले इलाकों से अपनी सेनाएं वापस बुलाने और सामान्य रिश्ते बहाल करने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई.

यह समझौता इसलिए भी इतिहास में दर्ज है क्योंकि इसके अगले ही दिन लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हो गया. उनकी अचानक हुई मौत के कारण इस समझौते को लेकर भारत में लंबे समय तक चर्चा होती रही.

शिमला समझौता, 1972

1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध दोनों देशों के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ था. इस युद्ध के बाद बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश बना और पाकिस्तान को बड़ा राजनीतिक और सैन्य झटका लगा. युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहद खराब थे.

ऐसे समय में 2 जुलाई 1972 को भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसका मकसद युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच सामान्य संबंध बनाने की कोशिश करना था.

इस समझौते में दोनों देशों ने अपने विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत के जरिए सुलझाने पर जोर दिया. जम्मू-कश्मीर में युद्धविराम रेखा को नियंत्रण रेखा यानी LoC के रूप में स्वीकार किया गया. दोनों देशों ने एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात भी कही.

आज भी भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत की बात होने पर शिमला समझौते का जिक्र जरूर होता है.

लाहौर घोषणा, 1999

1998 में भारत और पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किए. इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया और दुनिया की नजर दक्षिण एशिया पर टिक गई. परमाणु हथियारों से लैस दो पड़ोसी देशों के बीच तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ने लगी.

इसी माहौल में फरवरी 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान पहुंचे. उन्होंने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ बातचीत की और दोनों देशों ने लाहौर घोषणा पर सहमति जताई.

इस घोषणा में दोनों देशों ने शांति बनाए रखने, परमाणु हथियारों से जुड़े जोखिम कम करने और आपसी बातचीत को आगे बढ़ाने की बात कही. वाजपेयी की लाहौर यात्रा से भारत-पाकिस्तान रिश्तों में नई शुरुआत की उम्मीद जगी.

हालांकि कुछ महीनों बाद कारगिल संघर्ष शुरू हो गया और दोनों देशों के रिश्तों में फिर तनाव बढ़ गया. इससे पता चला कि समझौते के बावजूद दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी काफी गहरी थी.

इन समझौतों से क्या बदला?

भारत और पाकिस्तान के इतिहास में इन पांच समझौतों की अपनी अलग भूमिका रही. 1950 का नेहरू-लियाकत समझौता अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़ा था. 1960 की सिंधु जल संधि ने नदियों के पानी के बंटवारे का रास्ता तय किया. ताशकंद समझौते ने 1965 के युद्ध के बाद शांति की कोशिश की. शिमला समझौते ने 1971 के युद्ध के बाद रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश की. वहीं लाहौर घोषणा ने परमाणु तनाव के बीच शांति की उम्मीद जगाई.

इन समझौतों की सबसे बड़ी सीख यही है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के बावजूद बातचीत का रास्ता हमेशा मौजूद रहा है. कई बार युद्ध और विवादों ने इन कोशिशों को कमजोर किया, लेकिन इन समझौतों ने यह साबित किया कि मुश्किल हालात में भी बातचीत के जरिए समाधान खोजने की कोशिश की जा सकती है.