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मकर संक्रांति पर क्यों है दही-चूड़ा और तिल खाने का विशेष महत्व, क्यों कहलाता है यह उत्तरायण?

BY -
Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 19, 2026, 2:04:07 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): भारत में मकर संक्रांति का पर्व हर वर्ष 14 जनवरी को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यह त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है. बिहार और उत्तर प्रदेश में इसे खिचड़ी पर्व कहा जाता है, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में पोंगल, महाराष्ट्र और तेलंगाना में मकर संक्रांति, असम में भोगाली बिहू और पंजाब में लोहड़ी के नाम से यह पर्व प्रसिद्ध है. नाम भले अलग हों, लेकिन इस त्योहार का मूल भाव एक ही है, सूर्य उपासना और फसल उत्सव.

मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है
मकर संक्रांति एक प्रमुख हिंदू पर्व है, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने का प्रतीक है. यह त्योहार सौर कैलेंडर पर आधारित है, इसलिए इसकी तिथि लगभग हर साल समान रहती है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है. इसे ऋतु परिवर्तन और नई फसल के आगमन का संकेत माना जाता है. मकर संक्रांति के साथ ही शीत ऋतु का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगता है और कृषि कार्यों में तेजी आती है. इसी कारण यह पर्व किसानों के लिए भी विशेष महत्व रखता है.

मकर संक्रांति को उत्तरायण क्यों कहा जाता है
मकर संक्रांति को उत्तरायण इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन से सूर्य अपनी उत्तर दिशा की यात्रा शुरू करता है. खगोलीय दृष्टि से यह वह समय होता है, जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है. इस बदलाव के साथ दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं. भारतीय परंपरा में दिन को प्रकाश, ज्ञान और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है, जबकि रात को अज्ञान और नकारात्मकता से जोड़ा जाता है. इसलिए उत्तरायण को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उत्तरायण काल को शुभ और पुण्यकारी समय माना गया है.

दही-चूड़ा और तिल खाने की परंपरा क्यों है खास
मकर संक्रांति पर खानपान का विशेष महत्व होता है. इस अवसर पर अलग-अलग राज्यों में स्थानीय व्यंजन बनाए जाते हैं. बिहार और उत्तर प्रदेश में दही-चूड़ा यानी दही और पोहा खाने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है. मान्यता है कि दही-चूड़ा भगवान सूर्य को प्रिय है और इसे भोग के रूप में अर्पित करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं. धार्मिक विश्वास के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन दही-चूड़ा का सेवन करने से सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

इसके अलावा तिल का भी इस पर्व से गहरा संबंध है. तिल से बने लड्डू, मिठाइयां और अन्य व्यंजन इस दिन विशेष रूप से बनाए जाते हैं. आयुर्वेद के अनुसार, तिल शरीर को गर्मी प्रदान करता है और सर्द मौसम में स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है. साथ ही, तिल को दान और पुण्य से भी जोड़ा गया है. मान्यता है कि मकर संक्रांति पर तिल का दान करने से ग्रह दोष कम होते हैं और शुभ फल की प्राप्ति होती है.

फसल और आस्था का संगम
मकर संक्रांति पूरे भारत में फसल के आगमन और सूर्य उपासना का उत्सव है. भले ही रीति-रिवाज और नाम अलग हों, लेकिन इस पर्व का उद्देश्य एक ही है, प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करना और नई शुरुआत का स्वागत करना. यही कारण है कि मकर संक्रांति को भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है.

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