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नीतीश कुमार के फैसले पर क्यों नहीं हो रहा किसी को भरोसा? क्या आसपास की चौकड़ी के ग्रिप में फंस गए!

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: March 6, 2026, 3:41:22 PM

धनबाद(DHANBAD): नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से किसको कितना फ़ायदा होगा ? नीतीश कुमार का राज्यसभा में जाना क्या उनका खुद का निर्णय है? क्या वह भाजपा से अधिक   अपने आसपास रहने वाले लोगों की राजनीति के शिकार हो गए हैं? 2025 के चुनाव में भी कई तरह के रंग देखे गए थे.  बिहार छोड़ने का निर्णय नीतीश कुमार खुद लिया होगा , इस पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा है.  यह  अलग बात है कि गुरुवार को उन्होंने स्वयं सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की.  बावजूद  किसी को यह पच  नहीं रहा है.  राजनीतिक पंडित अलग-अलग ढंग से तर्क दे रहे है.  उनका कहना है कि लंबे समय से उनके आसपास रहने वाले लोग भाजपा के संपर्क में थे और वह चाह रहे थे कि किसी तरह से नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति से दूर किया जाए. 

नीतीश कुमार के रहते किसी का राजनीतिक  कद बढ़ता क्या ?

 इसके पीछे उनका स्वार्थ  लेकिन भाजपा की मनसा अधिक रही होगी।  क्योंकि इतना तो तय है कि नीतीश कुमार के रहते भाजपा का कोई भी नेता बिहार में पनप नहीं सकता है.  भाजपा यह पूरी तरह से ठोक -पीट कर देख चुकी है और यही वजह है कि जदयू को कम सीट  आने के बावजूद भाजपा उनको मुख्यमंत्री बनाये रखा.  2025 के चुनाव परिणाम के बाद  भी भाजपा सीधे तौर पर नीतीश कुमार को हटाने से परहेज किया।  हो सकता है कि नीतीश कुमार को यह  समझाया गया हो कि उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक एंट्री का यही सही वक्त है.  लेकिन क्या नीतीश कुमार की तरह निशांत कुमार बिहार की राजनीति में सफल हो पाएंगे? यह बड़ा सवाल है.  

बिहार की राजनीति में कितने सफल हो पाएंगे निशांत कुमार ?

अगर निशांत कुमार को पॉलिटिक्स में एंट्री ही दिलानी थी तो बढ़िया होता कि उन्हें राज्यसभा भेज दिया जाता।  जहां से वह राजनीति के ककहरा भी सिखते।   लेकिन अब चर्चा है कि डिप्टी सीएम बनाकर  निशांत कुमार की एंट्री राजनीति में कराई जाएगी।  यह चर्चा अगर वास्तविकता में बदल भी गई तो जदयू का क्या होगा? क्या ऐसा तो नहीं कि नीतीश कुमार के सहयोगी ही पार्टी को "हाईजैक" करने और भाजपा में अपनी कद बढ़ाने के लिए एक प्लान तैयार किया? हो सकता है कि यह प्लान भाजपा की ओर से ऑफर किया गया हो.  चुकि  नीतीश कुमार राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी माने जाते है.  हो सकता है कि स्वास्थ्य की वजह से वह निर्णय लेने में अपने को फिट नहीं महसूस कर रहे हो और सब कुछ पहले तैयार किए गए प्लान  के आधार पर किया गया हो? इतनी आसानी से नीतीश कुमार राज्यसभा जाने की हामी  भरेंगे, यह  किसी को समझ में नहीं आ रहा है.  राजनीतिक पंडित भी माथा पीट रहे हैं. 

नीतीश कुमार की गैरमौजूदगी में भाजपा को भी क्यों  करना पड़ेगा संघर्ष?
 
यह  अलग बात है कि नीतीश कुमार को दिल्ली शिफ्ट कराकर भाजपा को बिहार में राजनीति करना भी बहुत आसान नहीं होगा।  क्योंकि बिहार में कोई भी विपक्षी दल हो, नीतीश कुमार की की "गुगली"  में वह फंसता  रहा है.  भाजपा भी इस बात को जानती है कि नीतीश कुमार अगर दिल्ली शिफ्ट होते हैं तो विपक्षी दल एक बार फिर जमीन पर उतरकर राजनीति करेंगे और ऐसे में तिकड़म की राजनीति नहीं चलेगी। सूत्र बताते  है कि नीतीश कुमार के "किचन कैबिनेट" की पीठ पर हाथ रखकर भाजपा ने बिहार में अपना रास्ता खोज लिया है.  भाजपा के लिए अब मुख्यमंत्री की कुर्सी बहुत दूर नहीं रह गई है.  नीतीश कुमार अप्रैल महीने में राज्यसभा जाएंगे, उसके बाद बिहार सरकार का नेतृत्व भाजपा के हाथ में होगा। 

बिहार और दिल्ली दोनों को एक साथ साधने की क्या हुई है कोशिश ?
 
दरअसल, भाजपा की राजनीति सिर्फ बिहार के लिए ही नहीं बल्कि दिल्ली के लिए भी काम आ सकती है.  नीतीश कुमार को दिल्ली शिफ्ट कराकर भाजपा में निश्चिन्त  हो जाएगी कि केंद्र में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी और नीतीश कुमार की पार्टी साथ आकर केंद्र सरकार के सामने अब कोई संकट पैदा नहीं कर सकेंगे।  लोकसभा में जदयू के 12 और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी के 16 सांसद हैं.  नीतीश कुमार एक कुशल सियासी रणनीतिकार माने जाते है ।  ऐसे में उनका यह निर्णय उनके लिए ,उनकी पार्टी के लिए,उनके बेटे के लिए  बहुत अच्छा राजनीतिक पंडित नहीं मान रहे हैं.  यह  अलग बात है कि उनके सहयोगियों के कंधे पर रखकर एक ऐसी चाल चली गई है, जिससे बिहार में भाजपा  वर्चस्व बढ़ेगा और केंद्र का खतरा भी टला  रहेगा।  देखना दिलचस्प होगा कि आगे आगे होता है क्या--?

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