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JHARKHAND: एक दिन पहले ही सत्र के समापन के लिए कौन है दोषी, जनता के करोड़ों रुपए का कौन देगा हिसाब- विश्लेषण

JHARKHAND: एक दिन पहले ही सत्र के समापन के लिए कौन है दोषी, जनता के करोड़ों रुपए का कौन देगा हिसाब- विश्लेषण

रांची (RANCHI): लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. सत्ता का दायित्व होता है कि वो विपक्ष को बोलने की आजादी थे. लेकिन बात केंद्र की हो या राज्य की, मानसून सत्र में दोनों ही जगह विपक्ष के शोर और हंगामे ही दिखे. झारखंड में 29 जुलाई से सत्र शुरू हुआ, जिसे 5 अगस्त तक चलना था. लेकिन उसे एक दिन पहले ही स्थगित कर दिया गया. स्पीकर रविंद्रनाथ महतो ने दलील दी कि विपक्ष के बार-बार गतिरोध होने की वजह से सत्र की कार्यवाही को समय से 1 दिन पहले ही स्थगित कर दिया है. चलिये समझने की कोशिश करते हैं.

सत्ता में कौन, विपक्ष कौन

झारखंड में हेमंत सोरेन की अगुवाई में झामुमो, कांग्रेस, राजद की गठबंधन सरकार है. इसे एनसीपी, सीपीआई एमएल और एक निर्दलीय विधायक का भी समर्थन हासिल है. दूसरी ओर भाजपा और आजसू पार्टी विपक्ष की भूमिका में हैं. सरकार का गठन 29 दिसंबर 2019 को हुआ था.

भाजपा ने शुरू से अपनाया आक्रामक रुख

सत्र के शुरुआत से ही विपक्ष ने राज्य में खनीज की लूट, भ्रष्टाचार, गौ तस्करी, उर्दू स्कूल और अकाल के मुद्दे पर हंगामा करना शुरू कर दिया. इसके साथ ही तीन कांग्रेसी विधायकों का लाखों रुपए नकदी के साथ बंगाल में पकड़ा जाना, सीएम के मीडिया सलाहकार अभिषेक प्रसाद उर्फ पिंटु की ईडी से पूछताछ, आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल की गिरफ्तारी, ईडी के छापे में करोड़ों रुपए की बरामदगी, हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा की गिरफ्तारी और उनके ठिकाने पर ईडी के छापे समेत कई सवालों से विपक्ष सरकार को घेरना चाहता था. साथ ही प्रदेश में अकाल घोषित करने की भी उसकी मांग रही.

उनका काम हंगामा, हमारी कोशिश सूरत बदलनी चाहिए-सत्ता पक्ष

लेकिन सत्ता का आरोप है कि विपक्ष का मकसद सिर्फ हंगामा खड़े करना रहा, जबकि सरकार की काेशिश है कि सूबे की सूरत बदले. भाजपा के विधायकों ने सदन के बाहर भी अकाल-सूखा को लेकर नाटकीय प्रर्दशन कर सरकार का ध्यान खींचना चाहा. सदन में हंगामे के आरोप में परसों स्पीकर ने भाजपा के चार विधायकों को सदन से तीन दिनों के लिए निलंबित कर दिया. इसके बाद कल सदन जैसे ही शुरू हुई, निलंबन वापस करने की मांग को लेकर विपक्ष ने बॉय काट कर दिया. बाहर ही सदन लगा ली. आज जब स्पीकर ने तीसरे दिन के खत्म होने से पहले ही निलंबित ढुल्लू महतो, जेपी पटेल, भानुप्रताप शाही और रणधीर सिंह का निलंबन वापस लिया तो भी विपक्ष शांत नहीं हुआ. विधायक स्पीकर कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गए. पूर्व सीएम व नेता प्रतिपक्ष (हालांकि स्पीकर ने अबतक मान्यता नहीं दी है) बाबूलाल मरांडी ने सरकार पर स्कूलों का इस्लामीकरण करने और गौ तस्करी को प्रश्रय देने का आरोप लगाया. इसके बाद स्पीकर ने सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने की घोषणा की. विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर सत्ता के लिए काम कर रहे हैं.

सरकार की भूमिका को समझिये

महज विपक्ष पर दोष मढ़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है. जबकि स्पीकर ने जो तर्क दिये हैं, उसके आरोप केंद्र में भाजपा ही है. उन्हें सरकार में शामिल दलों की भूमिका की भी चर्चा करनी चाहिए थी. क्या सत्ता पक्ष के विधायकों ने सकारात्मक रोल निभाया. सवाल यह भी उठ रहे हैं कि कहीं सीएम के दबाव में तो स्पीकर ने सदन स्थगित नहीं की. आखिर हेमंत सोरेन किस दबाव में आजकल हैं. कुछ भी कारण रह हो, करोड़ों रुपए जनता के ही तो खर्च हुए.

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इस बीच सरकार ने पास करा लिये चार विधेयक

इधर, महज 36 मिनट में कल सत्र के चौथे दिन सत्ता पक्ष ने चार बिल पास करा लिये. इसमें झारखंड माल एवं सेवा कर संशोधन विधेयक 2022, पंडित रघुनाथ मुर्मू जनजातीय विश्वविद्यालय विधेयक, झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2022 और झारखंड कराधान अधिनियमों की बकाया राशि का समाधान विधेयक 2022 शामिल है. इसमें एक बिल की प्रशंसा हो रही है. दरअसल झारखंड गठन के लगभग 21 वर्ष बाद जनजातीय आबादी के आधार पर झारखंड में पहला जनजातीय विश्वविद्यालय बनने जा रहा है.

सदन की कार्यवाही पर प्रति घंटे होते हैं लाखों रुपए खर्च

पिछले शीतकालीन सत्र की बात करें तो लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर सरकारी डाटा के मुताबिक 144 करोड़ रुपए का खर्च आया था. संसद की कार्यवाही पर प्रति घंटे 1.5 करोड़ रुपए खर्च होते हैं. यह आंकडा मंत्रियों, सांसदों के वेतन, सदनों के कर्मचारियों के वेतन, भवनों की बिजली आदि के खर्च के औसत से निकाले जाते हैं. केंद्र सरकार आंकड़े जारी करती है, लेकिन राज्य सरकार ऐसा कोई आंकड़ा जारी नहीं करती है. लेकिन यदि यहां मंत्री, विधायक के वेतन और विधानसभा के कर्मचारियों के वेतन और अन्य खर्च को शामिल किया जाए तो प्रति घंटे लाखों रुपए सदन की कार्यवाही पर खर्च होते हैं. क्योंकि पहले ही विधायकों का वेतन-भत्ता 90 हजार से बढ़ाकर 2.25 लाख किया, मंत्रियों का 2.70 लाख, मुख्यमंत्री का 3 लाख किया जा चुका है. इनकम टैक्स भी सरकार ही चुकाती है.

 

Published at:04 Aug 2022 05:55 PM (IST)
Tags:News
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