टीएनपी डेस्क(TNP DESK): विश्व के प्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों में टाटा स्टील और टाटा समूह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है.आज टाटा समूह 100 से अधिक देशों में अपना कारोबार फैला चुका है और विश्व स्तर पर एक भरोसेमंद ब्रांड के रूप में अपनी पहचान बना चुका है लेकिन टाटा की असली ताकत सिर्फ उसका व्यापार नहीं, बल्कि उसके मूल्यों और इंसानियत से जुड़ी सोच है.टाटा स्टील को अक्सर उद्योग जगत में शीर्ष स्थान पर देखा जाता है, लेकिन जब बात नैतिकता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी की आती है, तो यह समूह वहाँ भी सबसे ऊपर नजर आता है.
व्यापार केवल मुनाफ़े के लिए नहीं इंसानियत के लिए भी
टाटा का मानना है कि व्यापार केवल मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि समाज और हर जीव के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम भी होना चाहिए.यही कारण है कि टाटा के कई शोरूम और दफ्तरों में एक अनोखी संस्कृति देखने को मिलती हैजहाँ आवारा या जंगली कुत्तों को भगाया नहीं जाता, बल्कि उन्हें अपनाया जाता है.इस सोच के पीछे सबसे बड़ा योगदान रतन टाटा का है.
जानवरों और इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं
रतन टाटाजानवरों और इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं सिर्फ एक सफल उद्योगपति ही नहीं, बल्कि एक बेहद दयालु और संवेदनशील इंसान भी थे.वे जानवरों और इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं करते थे.उनका मानना था कि हर जीव को जीने का समान अधिकार है और उनके साथ किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं होना चाहिए.रतन टाटा को खासतौर पर कुत्तों से बेहद लगाव था. यही वजह है कि उनकी सोच आज भी टाटा समूह की कार्यसंस्कृति में झलकती है. कई टाटा शोरूम और ऑफिस में आवारा कुत्ते बिना किसी रोक-टोक के अंदर आते-जाते दिख जाते है.कई बार उन्हें ठंड या बारिश से बचने के लिए अंदर बैठने दिया जाता है. यह कोई आधिकारिक नियम नहीं, बल्कि एक मानवीय परंपरा है जो धीरे-धीरे टाटा की पहचान बन चुकी है.
रतन टाटा की मानवीय सोच आज भी दिखती है
आज भले ही रतन टाटा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी दयालुता, सह-अस्तित्व और इंसानियत की सोच आज भी जिंदा है. टाटा समूह सिर्फ एक व्यापारिक संगठन नहीं, बल्कि एक ऐसी विचारधारा का प्रतीक है, जो सिखाती है कि असली सफलता वही है जिसमें इंसानियत और करुणा भी शामिल हो.
पढ़े रतन टाटा से संबंधित प्रेरणादायक कहानी
इस मानवीय सोच के पीछे रतन टाटा से जुड़ी एक प्रेरक कहानी भी बताई जाती है.कहा जाता है कि एक दिन वे मुंबई स्थित बॉम्बे हाउस में मौजूद थे, तभी बाहर तेज बारिश शुरू हो गई. इमारत के बाहर कई आवारा कुत्ते भीगते हुए इधर-उधर छिपने की कोशिश कर रहे थे. यह दृश्य देखकर रतन टाटा भावुक हो उठे उन्होंने तुरंत सुरक्षा कर्मियों को निर्देश दिया कि उन कुत्तों को अंदर आने दिया जाए, ताकि वे बारिश से बच सकें और सुरक्षित रह सकें.यहीं से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत मानी जाती है,धीरे-धीरे यह सोच सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक आदत और पहचान बन गई.