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वरुण गांधी ‘भगवा’ राजनीति का चेहरा -राहुल गांधी, ‘भगवा’ से भागे वरुण को ‘राहुल की पहेली’  

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 3:05:59 AM

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): अपनी भारत यात्रा के दौरान भाई वरुण गांधी का कांग्रेस में शामिल होने के प्रश्न पर राहुल गांधी ने कहा है कि उन्हें वरुण गांधी को गले लगाने में कोई परहेज नहीं है, लेकिन वह उस राजनीति को गले नहीं लगा सकते, जिसका सफर अब तक वरुण गांधी करते रहे हैं. बता दें कि वरुण गांधी के पिता संजय गांधी की मौत के बाद से ही मेनका गांधी के द्वारा कांग्रेस विरोध की राजनीति की जाती रही है, राहुल गांधी आज जिस वरुण गांधी को भगवा राजनीति का चेहरा बता रहे हैं, संजय गांधी की मौत के बाद इन भगवाधियों के सिवा तब मेनका गांधी के पास कोई ज्यादा विकल्प नहीं था और तब की भाजपा के पास भी मेनका के साथ ज्यादा सौदेबाजी की गुंजाइश नहीं थी. 

इसी भगवा राजनीति ने मेनका से लेकर वरुण को सत्ता के करीब रखा

कहा जा सकता है इसी भगवा राजनीति ने मेनका से लेकर वरुण को सत्ता के करीब रखा है. नहीं तो बहुत हद तक ये गुमनामी की जिंदगी में खोये रहते. लेकिन जब तक अटल आडवाणी की भाजपा रही है, मेनका और वरुण को कोई खास परेशानी नहीं हुई, लेकिन अब भाजपा वह नहीं रही, और ना ही उसे मेनका और वरुण जैसे किसी गांधी परिवार के चेहरे की भाजपा को जरुरत है. अब भाजपा अपनी जमीन खुद तैयार कर चुकी है. 

वरुण ने बनाई फायर ब्रांड भगवा नेता की छवि

यहां बता दें कि भगवा खेमे का फायर ब्रांड नेता रहे वरुण गांधी पिछले कुछ दिनों से भगवा राजनीति से परहेज करते नजर आ रहे हैं. किसानों की समस्या हो या उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार, वह लगातार अपने बयानों से भाजपा के लिए असहज स्थितियां पैदा कर रहे हैं. इसके साथ ही वह प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों को प्रकारांन्तर से विभाजनकारी राजनीति बता रहे हैं, उनके द्वारा युवाओं को रोजगार, किसानों की समस्या और बढ़ती महंगाई को लगातार मुद्दा बनाया जा रहा है. कहा जा सकता है पीएम मोदी को घेर कर अपने भातृत्व प्रेम को सामने लाने में गुरेज नहीं कर रहें. सिर्फ वरुण गांधी ही नहीं, उनकी मां मेनका भी अपने सवालों से मोदी सरकार को घेर रही है.

क्या कांग्रेस में जायेंगे वरुण, क्या वरुण सुलझा पायेंगे राहुल गांधी की पहेली

यही कारण है कि वरुण और मेनका का कांग्रेस में जाने की चर्चा आम है, लेकिन राहुल गांधी यह कह कर क्या संदेश देना चाह रहे हैं कि उन्हें वरुण गांधी को गले लगाने में कोई परहेज नहीं है, लेकिन वह उस राजनीति को स्वीकार नहीं कर सकते, जिसके द्वारा देश में विभाजन की राजनीति की जाती है. इसे वरुण गांधी का कांग्रेस में इंट्री का संकेत माना जाय? या नो इंट्री का सिग्नल, यही राहुल गांधी की पहेली है, जिसे सुलझाने की जिम्मेवारी वरुण गांधी को दी गयी है. 

क्या बदल जाती है रातों रात वैचारिक प्रतिबद्धता 

क्या राहुल गांधी यह मानते हैं कि किसी की वैचारिक प्रतिबद्धता रातों रात बदल जाती है?  क्योंकि वरुण गांधी की विचारधारा में कोई परिवर्तन तो देखने को नहीं मिल रहा है, हां, भाजपा में उन्हें भाव नहीं दिया जा रहा है, इसकी खीज उनमें जरुर है.

रिपोर्ट: देवेन्द्र कुमार, रांची 

Tags:rahul gandhiVarun GandhiVarun Gandhi is the face of 'saffron' politics

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