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लोक आस्था के महापर्व छठ का दूसरा दिन आज, दिनभर उपवास के बाद रात्रि में खरना पूजन

BY -
Varsha Varma CE
Varsha Varma CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: March 23, 2026, 5:11:08 PM

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): चैती छठ महापर्व की शुरुआत नहाय-खाय के साथ हो चुकी है. आज इस महापर्व का दूसरा दिन है, जिसे खरना के रूप में मनाया जाता है. इस दिन छठ व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं और शाम को सूर्यास्त के बाद विधि-विधान से पूजा कर उपवास खोलती हैं. प्रसाद के रूप में कई जगहों पर खीर-पूड़ी तो कही अरवा चावल और दाल का प्रसाद बनाया जाता है, जिसे ग्रहण कर व्रती अपना उपवास तोड़ती हैं.  इसके बाद कल संध्या अर्घ्य दिया जाएगा और 25 मार्च को उषा अर्घ्य के साथ इस महापर्व का समापन होगा. खरना के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है, जो उषा अर्घ्य देने के बाद समाप्त होता है. उषा अर्घ्य के बाद छठ व्रती घाट पर ही अपना व्रत खोलती हैं और इसी के साथ महापर्व का समापन हो जाता है.

 लोक आस्था का महापर्व छठ सूर्य देवता और छठी मईया को समर्पित है. चैती छठ पर्व खासतौर पर भारत के बिहार, झारखंड में मनाया जाता है. मान्यता है कि अगर श्रद्धा और आस्था के साथ छठ पर्व करने से हर कामना पूरी होती है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. छठ पर्व के दूसरे दिन यानी खरना पर शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना होता है. सुबह-सवेरे स्नान करने के बाद व्रती पूरे दिन के उपवास का संकल्प लेती है. पूजा की तैयारी के करने में जुट जाती है. शाम होते ही छठी मईया की पूजा की जाती है और सबसे पहले उन्हें भोग लगाया जाता है. इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करती है और फिर परिवार के अन्य लोग भी प्रसाद का भोग ग्रहण करते हैं. खरना करने के बाद 36 घंटे के निर्जला व्रत की शुरुआत भी हो जाती है.

खरना के बाद से लेकर ऊषा अर्ध्य तक व्रती अन्न-जल का बूंद भी ग्रहण नहीं करती. खरना के बाद व्रती सीधे 25 को पारण करेंगी. इसलिए छठ को हिंदू धर्म के सबसे कठिन व्रतों में एक माना जाता है. छठ प्रकृति और सूर्य उपासना का पर्व है, छठ के दौरान व्रती कठिन तपस्या के माध्यम से सूर्य देव और छठी मैया से अपने परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं.

खरना के बाद चैती छठ के तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को और चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिए जाने की परंपरा है. इस दौरान व्रतधारी पूरे विधि-विधान के साथ नदी, घाट पर पहुंचकर सूर्य देव और छठी मईया की पूजा करते हैं. आजकल कई लोग किसी कारण से अगर घाट नही जा पाते है तो घर के छत या आंगन में भी किसी बाथटब या घेरा बनाकर जलभराव कर छठ पूजा करते हैं. पूजा के लिए बांस के सूप या दउरा में ठेकुआ, मौसमी फल, फूल, नारियल, गन्ना और अन्य सामग्री सजाई जाती है. अर्घ्य देते समय व्रती कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को जल-दूध से अर्घ्य देती है. उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद चार दिवसीय छठ पर्व का समापन हो जाता है.

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