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हिजला मेला में कायम है परंपरागत खेलों का जलवा, हाथ पैर बांधकर मासूम को उतरा जाता है मैदान में

BY -
Vinita Choubey  CE
Vinita Choubey CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 4:23:52 PM

दुमका (DUMKA) : हमारे देश का राष्ट्रीय खेल भले ही हॉकी हो, लेकिन खेल के प्रति जब दीवानगी की बात होती है तो पहला नाम क्रिकेट का ही आता है. लेकिन इस सब के बाबजूद भारत के परंपरागत खेलों का जलवा आज भी कायम है. यह अलग बात है कि परंपरागत खेल के खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच कम मिलता है लेकिन जब मिलता है तो ग्राउंड तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है. बहुत कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों दुमका के हिजला में देखने को मिल रहा है. देखिए The News Post की खास रिपोर्ट...

किसी के हाथ बंधे हैं तो किसी के पैर फिर भी बेहद खुश नजर आ रहे है बच्चे

मासूम बच्चों के इन समूहों को देखिए. किसी के हाथ बंधे है तो किसी के पैर, वह भी अपने दोस्त के पैर के साथ. तो किसी के पैर को बोरी में कैद करके रखा गया है. इन दृश्यों को देख कर एक नजर में यही लगता है कि इन्हें किसी गलती की सजा दी गई हो. लेकिन हकीकत कुछ और ही है. हाथ पैर बंधे होने के बाबजूद ये बच्चे बेहद खुश नजर आ रहे हैं. हो भी क्यों नहीं, इन्हें अपनी प्रतिभा का पुरस्कार लेना है. ये भारत के परंपरागत खेल के खिलाड़ी हैं जो दुमका के हिजला में इन दिनों अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेर रहे हैं.

राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव में है परंपरागत खेलों का जलबा

दरअसल दुमका शहर से सटे हिजला गांव में मयूराक्षी नदी के तट पर इन दिनों हिजला मेला लगा है. मेला का इतिहास काफी पुराना है. सन 1890 में तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी ने हिज लॉ (His Law) नाम से इस मेला की शुरुआत की. कहा जा रहा है कि हिज लॉ का अपभ्रंश हिजला हो गया. समय के साथ हिजला मेला के पहले जनजातीय शब्द जुड़ा बाद में इसे राजकीय मेला का दर्जा मिल गया. 21 से 28 फरवरी तक चलने वाले राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव में जिला प्रशासन द्वारा कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. उसी में एक है परंपरागत खेलों की प्रतियोगिता. हिजला मैदान में आयोजित तीन पैर दौड़, जलेबी दौड़ और बोरी दौड़ लोगों के आकर्षण का केंद्र बिंदु रहा, जिसमें काफी संख्या में प्रतिभागियों ने अपनी प्रतिभा का जलबा दिखाया. आयोजन समिति द्वारा सफल प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया.

तीन पैर दौड़ में दो प्रतिभागियों के एक एक पैर को बांधकर उतरा जाता है मैदान में

तीन पैर दौड़ काफी रोमांचक दौड़ है. हर टीम में दो प्रतिभागी रहते है. दोनों प्रतिभागी का एक एक पैर आपस में बांध दिया जाता है. नाम के अनुरूप दो प्रतिभागियों को मिलकर तीन पैर बनाया जाता है. उसके बाद निर्धारित दूरी सबसे पहले तय करने वाले प्रतिभागी विजेता घोषित किए जाते हैं.

हाथ बंधे है तो क्या जलेबी खाकर रहेंगे बच्चे

जलेबी दौड़ में प्रत्येक प्रतिभागी का हाथ पीछे कर बांध दिया जाता है. निर्धारित दूरी पर रस्सी में जिलेबी लटका कर बांध दिया जाता है. प्रतिभागी निर्धारित दूरी तय कर जलेबी के पास पहुंचते है और रस्सी से लटके जलेबी को मुंह से पकड़कर खाना होता है. सबसे पहले मुंह में जलेबी लेने वाले प्रतिभागी विजेता घोषित किए जाते है.

कमर तक बोरी में बंद है पैर फिर भी दौड़ लगा रहे है बच्चे

बोरी दौड़ में प्रतिभागी का दोनों पैर एक बोरी में रख कर कमर के पास बोरी को बांध दिया जाता है. कूदते हुए प्रतिभागी को निर्धारित दूरी तय करना पड़ता है. सबसे पहले पहुंचने वाले प्रतिभागी विजेता घोषित होते है.

परंपरागत खेल को मिले बढ़ावा तो मोबाइल से निकल कर मैदान में पहुंचेगा बचपन

यह परंपरागत खेल सुनने में जितना आसान लगता है उतना आसान है नहीं. बच्चों का यह खेल कठिन होने के बाबजूद रोमांच से भरा होता है. लेकिन आज के समय में इस प्रकार के खेलों का आयोजन बहुत कम देखने को मिलता है. आज का बचपन मोबाइल गेम में उलझा रहता है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है. इसलिए जरूरत है परंपरागत खेल को बढ़ावा देने की ताकि बचपन मोबाइल से निकल कर मैदान में पहुंच सके.

रिपोर्च-पंचम झा

 

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