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कोर्ट का बड़ा फैसला, अब तलाक लेने पर इन महिलाओं को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता, जानिए कोर्ट ने क्यों लिया ये बड़ा फैसला

BY -
Vinita Choubey  CE
Vinita Choubey CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 6:28:28 AM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : पति-पत्नी के बीच तलाक के बाद मिलने वाला गुजारा भत्ता को लेकर कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि यदि जीवनसाथी कामकाजी और आत्मनिर्भर है तो उसे गुजारा भत्ता (एलिमनी) नहीं दिया सकता है. दिल्ली हाई कोर्ट ने ये फैसला एक मामले की सुनवाई के बाद कही.

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्थायी गुजारा भत्ता सामाजिक न्याय का एक साधन है, न कि सक्षम व्यक्तियों को समृद्ध बनाने या आर्थिक समानता प्राप्त करने का. न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि कहा कि गुजारा भत्ता मांगने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसे वास्तव में आर्थिक सहायता की आवश्यकता है.

जानिए क्या है पूरा मामला

पति पेशे से वकील हैं और पत्नी रेलवे में ग्रुप ए अधिकारी हैं. यह दोनों की दूसरी शादी थी. उन्होंने जनवरी 2010 में शादी की थी और 14 महीने बाद अलग हो गए. पति ने अपनी पत्नी पर मानसिक और शारीरिक क्रूरता, गाली-गलौज, अपमानजनक संदेश भेजने और सामाजिक समारोहों में उसका अपमान करने का आरोप लगाया था. हालाँकि, पत्नी ने इन आरोपों से इनकार किया और पति पर क्रूरता का आरोप लगाया.

फैमिली कोर्ट ने दोनों का तलाक का फैसला सुनाया. पत्नी ने तलाक के लिए ₹50 लाख की मांग की थी. अदालत ने इस बात को इस ओर इशारा माना कि तलाक के विरोध का कारण भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक था. उच्च न्यायालय ने भी पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि जब पत्नी स्व-नियोजित और आत्मनिर्भर थी, तो उसे गुजारा भत्ता देने का कोई औचित्य नहीं था.

इस बीच पत्नी को हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत बहू को ससुराल में रहने का अधिकार दिया है. कोर्ट ने कहा कि बिना उचित प्रक्रिया के उसे घर से बेदखल नहीं किया जा सकता. यह मामला दिल्ली के ओल्ड गोविंदपुरा एक्सटेंशन इलाके की एक संपत्ति से जुड़ा है, जहां बहू 2010 से अपने पति और ससुराल वालों के साथ रह रही थी. पति-पत्नी के बीच संबंध खराब होने के बाद 2011 से दोनों पक्षों के बीच कानूनी लड़ाई चल रही थी. सास और दिवंगत ससुर ने अदालत में दावा किया कि घर उनकी निजी संपत्ति है और बहू का उस पर कोई अधिकार नहीं है. उन्होंने उस पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया और 10,000 रुपये मासिक किराया मांगा. हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि घर साझा घर की परिभाषा में आता है, इसलिए बहू को वहां रहने का अधिकार है.

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