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नागवंशियों की कहानी कहता - नवरत्न गढ़ का किला अब ले चुका है खंडहर का रूप, जानिए इसका इतिहास

BY -
Prakash Tiwary
Prakash Tiwary
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 19, 2026, 2:03:45 PM

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): हमारे देश की ऐतिहासिक विरासत बहुत समृद्ध रही है. हर क्षेत्र की अपनी धन संपदा और वहां के समृद्ध लोग रहे हैं. हर क्षेत्र की अपनी एक कहानी है. कहीं राजा-महाराजाओं के बड़े-बड़े महल समृद्धि को बयां करते हैं तो कहीं आदिवासी राजाओं की अपनी सांस्कृतिक विरासत उनकी प्राचीनता को दर्शाते हैं. झारखंड की बात करें तो ये राज्य आदिवासियों की धरती के रूप में जाना जाता है. यहां प्रकृति ने अपनी सौन्दर्य की छटा बिखेरी है. प्रकृति और सुंदरता के साथ-साथ यहां कई ऐतिहासिक स्थल और किले भी मौजूद हैं. ऐसा ही एक किला है नवरत्न गढ़ का किला. चलिए जानते हैं ये किला क्यों खास है और इतिहास में ये क्यों अहमियत रखता है.    

झारखंड की राजधानी रांची से दक्षिण-पश्चिम में रांची से 70 किलोमीटर दूर दोयसा नगर अब एक गांव की शक्ल ले चुका है. गुमला जिले के सिसई थाने का यह गांव कभी नागवंशियों की राजधानी होता था. लेकिन आज ये उपेक्षा का दंश झेलते-झेलते नवरत्नगढ़ खंडहर में बदल चुका है. नवरत्नगढ़ का किला करीब एक सौ एकड़ में फैला है. यह किला नागवंशियों द्वारा मुगल स्थापत्य का पहला राजमहल माना जाता है. अपने अनूठे मौलिक सौन्दर्य और स्थापत्य कला के कारण खास पहचान बनाने वाले इस राजमहल का निर्माण 16वीं शताब्दी में नागवंशी राजा दुर्जन शाल ने कराया था.

इस किले का इतिहास

दुर्जनशाल ग्वालियर के किले में 12 साल तक बंदी थे. बंदी का कारण लगान नहीं देना था. उस समय के बिहार के सूबेदार इब्राहिम खान ने 1615 में उन्हें बंदी बनाया था. 12 साल बाद उन्हें उस बंदी से आजादी मिली. जहांगीर ने दो हीरे में से सही हीरे को परखने के कारण उन्हें आजाद किया था.

उन दिनों नागवंशी राजा की राजधानी खुखरा में थी. इब्राहिम खान ने जासूसी के मकसद से दुर्जनशाल के साथ एक आदमी को लगा रखा था जो आर्किटेक्ट था. हालांकि नागवंशी राजा कभी महल बनाकर नहीं रहते थे वो अपनी प्रजा के साथ ही घुल मिलकर रहते थे और राजा का आवास प्रजा से थोड़ा बड़ा होता था. दुर्जनशाल को उसी आर्किटेक्ट ने मुगल सम्राटों जैसा एक महल बनाने का सुझाव दिया था और दुर्जनशाल कैद के दौरान ग्वालियर में महली की शान-शौकत देख चुके थे. इसलिये वो आर्किटेक्ट के सुझाव पर राजी हो गये और दोयसा गांव में किले की नींव रखी गई और वहीं बना आलीशान नवरत्न गढ़ किला, जिसे झारखंड का हंपी भी कहा जाता है.

नागवंशी राजाओं की राजधानी

नागवंशियों की राजधानी हमेशा बदलती रही है. इनका इतिहास पहली सदी से शुरू होता है. नागवंशियों के पहले राजा थे फणी मुकुट राय, चौथे राजा मदन राय तक राजधानी सुतियांचे में रही, लेकिन पांचवें राजा प्रताप राय ने अपनी राजधानी सन् 307 में चुटिया ले गये, 29वें राजा भीम कर्ण ने 1079 ई. में खुखरा को राजधानी बनाया. 45वें राजा दुर्जन शाल ने अपनी राजधानी दोयसा गढ़ में बनाई.

 

नवरत्न गढ़ किले की संरचना

ये गढ़ पांच मंजिला है और हर मंजिल पर 9-9 कमरे हैं. गढ़ के चारों और मंदिर हुआ करते थे और मंदिर में बनी सुरंग से गढ़ में आना-जाना किया जा सकता था. आज किले की एक मंजिल जमीन में धंस चुकी है. इसलिये चार ही मंजिलें दिखाई देती है. किले के चारों तरफ सुरक्षाकर्मियों के लिये कोठरिया बनी हुई हैं. इस किले के निर्माण में इस्तेमाल चुना, सुर्खी और लाहौरी ईटों की सामग्री मुगल काल के स्थापत्य को दर्शाता है. रानी के रहने के लिये किले में अलग से भवन है. रानी के नहाने के लिये तालाब भी अलग है. किले से तालाब तक भी एक सुरंग है.

रातू उनकी आखिरी राजधानी मानी जाती है

इस गढ़ का निर्माण 1585 में हुआ था और फिर नवरत्न गढ़ को छोड़कर इनके 51वें राजा यदुनाथ शाह 1707 में पालनकोट चले गये. रातू उनकी आखिरी राजधानी मानी जाती है. इस किले को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल करने की मांग चल रही है. हालांकि किला आज अपने उस स्वरूप में नहीं है लेकिन अपने स्वर्णिम इतिहास को बखूबी बयां कर रहा है. झारखंड के प्रमुख यादगार स्मारकों में नवरत्न गढ़ को शुमार किया जाता है और शासन की ओर से इसके रख-रखाव के प्रति बढ़ी चेतना ने फिर से इसे दर्शनीय बनाने की ठानी है. सरकार अब राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने पर काफी काम कर रही है. इसलिए उम्मीद है कि किले के जीर्णोद्धार के लिए कदम उठाए जाएंगे. वह दिन दूर नहीं जब नवरत्न गढ़ किला अपने पूर्व रूप में जगमगायेगा और नई पीढ़ी स्वर्णिम इतिहास के दर्शन कर पाएंगे और इससे झारखंड पर्यटन को एक नया आयाम मिलेगा.

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