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झारखंड की सोहराय पेंटिंग को मिला ग्लोबल पहचान और GI टैग

BY -
Rashmi Prasad  CE
Rashmi Prasad CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: May 7, 2026, 4:59:30 PM

टीनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड की कला और संस्कृति अपनी सादगी और प्रकृति से जुड़ाव के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. अगर हम झारखंड की सांस्कृतिक पहचान की बात करें, तो सोहराय पेंटिंग (Sohrai Painting) का नाम सबसे ऊपर आता है. यह केवल एक चित्रकारी नहीं है, बल्कि यह आदिवासियों के प्रकृति प्रेम, परंपरा और उनके जीवन दर्शन का एक जीवंत दस्तावेज है.

मिट्टी की दीवारों पर उकेरी गई प्रकृति की दास्तान

झारखंड की संस्कृति में 'सोहराय' का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है. वर्ष 2020 में भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिलने के बाद इस कला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है. हजारीबाग जिले की पहाड़ियों और गांवों से निकली यह कला आज आधुनिक घरों और सरकारी इमारतों की शोभा बढ़ा रही है.

  1. सोहराय पेंटिंग का इतिहास और महत्व

सोहराय कला की जड़ें बहुत गहरी हैं. माना जाता है कि यह कला हजारों साल पुरानी है. हजारीबाग के 'इस्को' (Isko) गुफाओं में पाए गए शैल चित्रों (Rock Art) और आज की सोहराय पेंटिंग में काफी समानताएं मिलती हैं.

'सोहराय' शब्द की उत्पत्ति 'सोरो' से मानी जाती है, जिसका अर्थ है 'भगाना' या 'हकना'. यह नाम मुख्य रूप से पशुपालन और खेती से जुड़ा है. यह पेंटिंग मुख्य रूप से 'सोहराय पर्व' के दौरान बनाई जाती है, जो दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है. यह वह समय होता है जब धान की कटाई पूरी हो जाती है और किसान अपने पशुओं (गाय, बैल) के प्रति आभार व्यक्त करते हैं.

  1. सोहराय पेंटिंग की मुख्य विशेषताएं

सोहराय पेंटिंग की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और पारिस्थितिक मित्रता (Eco-friendliness) है. इसमें किसी भी प्रकार के रसायनों या कृत्रिम रंगों का प्रयोग नहीं होता.

  • प्राकृतिक रंग: इस चित्रकारी में केवल चार रंगों का प्रमुखता से उपयोग होता है, जो अलग-अलग प्रकार की मिट्टी से प्राप्त होते हैं. लाल मिट्टी (गरुआ), काली मिट्टी (मैंगनीज), पीली मिट्टी और सफेद मिट्टी (दुधी मिट्टी).
  • अनूठे उपकरण: ग्रामीण महिलाएं इसे बनाने के लिए बाजार के ब्रश का इस्तेमाल नहीं करतीं. इसके बजाय वे दातुन (कूचू), कपड़े के चिथड़े या सीधे अपनी उंगलियों का उपयोग करती हैं. यही कारण है कि इस पेंटिंग में एक कच्चापन और निखार एक साथ देखने को मिलता है.
  • प्रतीक और आकृतियां: सोहराय में प्रकृति की पूजा की जाती है. इसमें शेर, हाथी, हिरण, मोर, मछली और सांप जैसे जीवों के साथ-साथ कमल के फूल और लताओं को दर्शाया जाता है. 'पशुपति' (पशुओं के देवता) का चित्रण इसमें सबसे पवित्र माना जाता है.
  1. निर्माण की प्रक्रिया: कोहबर और सोहराय

अक्सर लोग सोहराय और कोहबर को एक ही मान लेते हैं, लेकिन दोनों के उद्देश्य अलग हैं.

  • कोहबर: यह मुख्य रूप से विवाह के अवसर पर घर के भीतरी कमरे (कोहबर) में बनाई जाती है, जो वंश वृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक है.
  • सोहराय: यह घर की बाहरी दीवारों पर बनाई जाती है. फसल कटाई के बाद घर की सफाई की जाती है और दीवारों पर मिट्टी का लेप लगाकर उस पर ये चित्र उकेरे जाते हैं. यह घर में समृद्धि और प्रकृति के स्वागत का प्रतीक है.
  1. सोहराय कला का सामाजिक पहलू

सोहराय पेंटिंग पूरी तरह से महिला प्रधान कला है. यह पीढ़ी दर पीढ़ी मां से बेटी को विरासत में मिलती है. गांव की महिलाएं सामूहिक रूप से दीवारों को सजाती हैं, जो उनके आपसी प्रेम और सहयोग को दर्शाता है. यह कला उनके लिए अभिव्यक्ति का एक माध्यम है, जहाँ वे बिना कुछ बोले प्रकृति के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करती हैं.

  1. आधुनिक युग में सोहराय: गाँव से शहर तक

एक समय था जब यह कला केवल हजारीबाग और चतरा के कच्चे घरों की दीवारों तक सीमित थी. लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है:

  • GI टैग का प्रभाव: 2020 में सोहराय-कोहबर कला को झारखंड का पहला GI टैग मिला. इससे कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी कला का उचित मूल्य और पहचान मिलने लगी है.
  • शहरीकरण: अब यह कला कैनवास, साड़ियों (Sohrai Sarees), बर्तनों और होम डेकोर की वस्तुओं पर भी दिखने लगी है. रांची और टाटा जैसे शहरों के रेलवे स्टेशनों और एयरपोर्ट की दीवारों पर विशाल सोहराय पेंटिंग्स देखी जा सकती हैं, जो पर्यटकों का मन मोह लेती हैं.
  • बुलु इमाम का योगदान: हजारीबाग के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और शोधकर्ता बुलु इमाम ने इस कला को दुनिया के सामने लाने में अपना जीवन समर्पित कर दिया. उनके प्रयासों से ही आज इस कला को वैश्विक कला दीर्घाओं में स्थान मिला है.
  1. भविष्य की चुनौतियां और अवसर

जैसे-जैसे गांवों में पक्के मकान बन रहे हैं, दीवारों पर मिट्टी की पेंटिंग करने की परंपरा कम हो रही है. हालांकि, इसे कैनवास और कपड़ों पर ले जाने से नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए रोजगार के अवसर खुले हैं. झारखंड सरकार भी इसे 'स्टार्टअप' और 'हस्तशिल्प' के माध्यम से बढ़ावा दे रही है.

सोहराय पेंटिंग केवल रंग और रेखाओं का खेल नहीं है, बल्कि यह झारखंड की मिट्टी की खुशबू है. यह हमें याद दिलाती है कि मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता कितना अटूट है. जब तक हम अपने जल, जंगल और जमीन का सम्मान करेंगे, सोहराय जैसी कलाएं जीवित रहेंगी.

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