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2024 की रणभेरी तेज! रामगढ़ और डुमरी के बाद सीएम हेमंत को आयी अल्पसंख्यक आयोग की याद, पहली बैठक आज

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 11, 2026, 8:14:55 AM

रांची(RANCHI)- रामगढ़ चुनाव में हार और डुमरी में संघर्षपूर्ण जीत के बाद बाद आखिरकार सीएम हेमंत को अल्पसंख्यकों की याद आयी, और बहुप्रतिक्षित अल्पसंख्यक आयोग का गठन कर 2024 के पहले अल्पसंख्यकों को इस बात का संकेत दिया गया कि देर ही सही लेकिन हेमंत सरकार अल्पसंख्यकों को भूली नहीं है.

आदिवासी, दलित और पिछड़ा के साथ अल्पसंख्यकों की जुगलबंदी

ध्यान रहे कि दोनों ही विधान सभा चुनावों में झाममो को अल्पसंख्यकों की नाराजगी का सामना करना पड़ा था, और इसी नाराजगी के कारण रामगढ़ विधान सभा में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, कुछ यही स्थिति डुमरी की भी थी, लेकिन एन वक्त पर सीएम हेमंत को इसका भान हुआ और चुनाव से ठीक पहले अल्पसंख्यक मंत्री हफीजुल हसन को डुमरी में तैनात कर दिया गया, ताकि वह अल्पसंख्यकों के बीच फैली नाराजगी को दूर कर सकें, और हफीजुल हसन ने भी इस कठीन टास्क को बेहतरीन अंदाज में पूरा किया, आज भी लोग मंत्री हफीजुल हसन की उस तस्वीर को नहीं भूले हैं, जब वह मोटरसाइकिल पर सवार होकर डुमरी के गली कुचों का सफर कर रहे थें, अल्पसंख्यकों को यह बताने की कोशिश कर रहे थें कि आपकी नाराजगी अपने जगह ठीक है, लेकिन यहां सवाल सरकार की साख का है, डुमरी की हार का मतलब  है हेमंत सरकार का इकबाल पर सवालिया निशान खड़ा होना, और यह हालत दलित पिछड़ों के साथ अल्पसंख्यक मतदाताओं के बेहतर नहीं होगा.

हफीजुल हसन ने पूरा किया टास्क

यह हफीजुल हसन की कोशिश और रणनीति ही थी कि ओबीसी की पार्टी एआईएआईएम के उम्मीदवार मोहम्मद मोबीन रिजवी को महज 3462 मतों पर सिमटना पड़ गया. नहीं तो यही मोहम्मद मोबीन रिजवी थें जिसने पिछला विधान सभा चुनाव में बगैर ओवैसी की प्रचार के करीबन 26 हजार मत प्राप्त किया था.

हिदायतउल्ला खां के नेतृत्व में बहु प्रतिक्षित अल्पसंख्यक आयोग का गठन

 

ध्यान रहे डुमरी चुनाव के दौरान ही यह बात तैरने लगी थी कि चुनाव खत्म होते ही हेमंत सरकार अल्पसंख्यकों को सामने रख कर कई योजनाओं की शुरुआत करने वाली है, और हुआ भी वही, जैसे ही बेबी देवी की जीत की घोषणा हुई, चंद दिनों के बाद अल्पसंख्यक आयोग के गठन का रास्ता साफ कर दिया गया. हिदायतउल्ला खां के नेतृत्व में बहु प्रतिक्षित अल्पसंख्यक आयोग का गठन कर दिया गया. इसके सथ ही डॉ. एम. तौशीफ, ज्योति सिंह मथारू, शमसेर आलम को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है, जिसकी आज पहली बैठक होने वाली है.

दूसरे राज्यों के कानूनों का भी अध्ययन करेगी आयोग

हालांकि अल्पसंख्यक आयोग की इस पहली बैठक के पहले डॉ. एम. तौशीफ ने काफी आशान्वित है, उनका दावा है कि इससे झारखंड के अल्पसंख्यकों की सामाजिक शैक्षणिक स्थिति में बड़ा सुधार आयेगा, खास कर शिक्षा के क्षेत्र में काफी कुछ करने की जरुरत है. डॉ. एम. तौशीफ ने इस बात का भरोसा भी दिलाया कि आयोग की पहली कोशिश दूसरे राज्यों के अल्पसंख्यक आयोग से जुड़े कानूनों का अध्ययन करने की होगी, हम यह जानने-समझने की कोशिश करेंगे कि हमारे पड़ोसी राज्यों में अल्पसंख्यक आयोग की ओर से किन किन गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है, और उसके कारण वहां के अल्पसंख्यकों की जिन्दगी में क्या बदलाव आया है. और उसके  बाद हम झारखंड के विशेष परिप्रेक्ष्य में उन सफल योजनाओं को यहां भी लागू करने का प्रयास करेंगे, इसके साथ ही जरुरत पड़ने पर झारखंड की जमीनी हकीकत और मांग को देखते हुए विशेष योजनाओं की शुरुआत करेंगे.

भाजपा पर निशाना

इस अवसर पर डॉ. एम. तौशीफ केन्द्र की मोदी सरकार पर भी निशाना साधने से नहीं चुके, उन्होंने इस बात का दावा कि कई प्रधानमंत्री के पास अल्पसंख्यकों के विकास के लिए, उनकी शिक्षा दीक्षा और रोजगार के लिए एक बड़ा फंड होता है, लेकिन आज इस फंड का क्या उपयोग हो रहा है किसी को कुछ पता नहीं, कई बार इस अल्पसंख्यकों के लिए आवंटित पैसे के बिल्डिगों को निर्माण होता, और वहां स्कूलों से लेकर कॉलेजों का संचालन होता है, लेकिन अल्पसंख्यक आयोग से संचालित होने वाले  इन कॉलेजों में अल्पसंख्यकों का ही नामांकन नहीं होता. इसकी सूचना भी नहीं दी जाती कि इस संस्थान का संचालन अल्पसंख्यकों के पैसे से किया जा रहा है, और हमारी बेटियां वहां नामांकन से वंचित हो जाती है, हम यह हालत झारखंड में बनने देना नहीं चाहते, जो भी होगा सब कुछ पारदर्शी तरीके होगा.

अल्पसंख्यकों की झारखंड में बड़ी आबादी

ध्यान रहें कि भारतीय संविधान के अनुसार अल्पसंख्यकों के तहत मुस्लिम, पारसी, जैन, बुद्ध, सिक्ख और ईसाई समुदाय की गिनती होती है, झारखंड में मुस्लिम और ईसाई समुदाय की एक बड़ी आबादी है, जबकि सिक्ख और जैन धर्मालंबी की भी यहां अच्छी खासी जनसंख्या है. इस प्रकार यदि अल्पसंख्यक आयोग इस समाज के लिए वास्तव में योजनाओं की शुरुआत करता हो तो उसका सीधा लाभ झारखंड की एक बड़ी आबादी को होगा.  

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