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प्रशांत दा उर्फ किशन दा 50 साल तक सिस्टम को चकमा देने वाले ‘भूत का जेल में निधन,  जानिए गिरफ्तारी के बाद कैसे टूट गया माओवादी नेटवर्क

BY -
Rajesh Tomar
Rajesh Tomar
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: April 3, 2026, 4:15:40 PM

TNP DESK- भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो कभी सुर्खियों में नहीं रहे, लेकिन पर्दे के पीछे पूरे खेल को नियंत्रित करते रहे. ऐसा ही एक नाम था प्रशांत बोस, जिन्हें माओवादी दुनिया में प्रशांत दा उर्फ किशन दा या काजल दा के नाम से जाना जाता था. 

पांच दशकों तक अंडरग्राउंड रहकर रणनीति बनाने वाला यह शख्स न सिर्फ माओवादी आंदोलन का दिमाग माना जाता रहा, बल्कि 2004 में दो बड़े उग्रवादी संगठनों के विलय का मुख्य वास्तुकार भी था.

नवंबर 2021 में झारखंड से हुई उनकी गिरफ्तारी को सुरक्षा एजेंसियों ने दशकों की सबसे बड़ी सफलता बताया. लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या किशन दा की गिरफ्तारी और फिर उनके मौत वाकई माओवादी आंदोलन की कमर तोड़ देगी या यह सिर्फ एक चरण है जो बाद में अपना रंग दिखाएगा. 

इस विशेष रिपोर्ट में हम समझते हैं कि प्रशांत दा उर्फ किशन दा का उदय, उनका नेटवर्क, उनकी रणनीति, गिरफ्तारी और उसके बाद बदलता माओवादी परिदृश्य.

एक अदृश्य नेता: क्यों खास थे किशन दा

प्रशांत बोस को अक्सर माओवादी आंदोलन का दिमाग कहा जाता था. जहां कई नेता मैदान में दिखते थे, वहीं बोस हमेशा पर्दे के पीछे रहे.उनकी खासियतें थीं कि वे 50 से अधिक वर्षों तक अंडरग्राउंड रहे, लगातार हुलिया बदलने की क्षमता रखते थे, सार्वजनिक उपस्थिति बेहद सीमित थी और वे रणनीतिक व वैचारिक नेतृत्व प्रदान करते थे.इंटेलिजेंस एजेंसियों के अनुसार, वे सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि विचारधारा के स्तंभ थे.

शुरुआत: नक्सल आंदोलन से माओवादी केंद्र तक

किशन दा का संबंध शुरू से ही कट्टर वामपंथी विचारधारा से रहा. उन्होंने Maoist Communist Centre of India के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया.

2004 में उन्होंने एक बड़ा कदम उठाया.

MCCI और CPI ML People’s War का विलय हुआ और नई पार्टी बनी CPI (Maoist).इस विलय में दो बड़े नाम थे. मुप्पला लक्ष्मण राव और प्रशांत बोस.यह विलय माओवादी आंदोलन के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हुआ और संगठन राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुआ.

पार्टी में भूमिका: नंबर 2 लेकिन असली ताकत

2004 से 2018 तक गनपति महासचिव रहे, लेकिन रणनीतिक नियंत्रण काफी हद तक किशन दा के पास था. वे Politburo सदस्य, Central Committee सदस्य और Eastern Regional Bureau के सचिव थे.इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के मुताबिक 1978 से 2018 तक वे संगठन के दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता रहे.

ERB: सात राज्यों का नेटवर्क

किशन दा के नेतृत्व में Eastern Regional Bureau सबसे मजबूत क्षेत्रीय नेटवर्क बना. मुख्य प्रभाव क्षेत्र में झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल शामिल थे. इसके अलावा ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और उत्तर पूर्व क्षेत्रों में भी नेटवर्क का विस्तार था

यह नेटवर्क केवल हमलों तक सीमित नहीं था बल्कि खनन क्षेत्र, लॉजिस्टिक सप्लाई और शहरी नेटवर्क तक फैला हुआ था.

रणनीति: दीर्घकालीन जनयुद्ध का मॉडल

किशन दा ने माओवादी रणनीति को तीन चरणों में लागू किया. पहला चरण अंडरग्राउंड संगठन निर्माण था. दूसरा चरण गुरिल्ला क्षेत्र तैयार करना था. तीसरा चरण जन विद्रोह की तैयारी था.उन्होंने खासतौर पर झारखंड के खनन और आदिवासी क्षेत्रों को केंद्र बनाया.

शीला मरांडी: समानांतर शक्ति केंद्र

किशन दा की पत्नी शीला मरांडी खुद एक प्रभावशाली माओवादी नेता रही हैं. वे केंद्रीय समिति की सदस्य थीं और सैन्य अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाती थीं. कई हमलों में उनकी भूमिका बताई जाती है. दोनों की जोड़ी को माओवादी आंदोलन की सबसे प्रभावशाली जोड़ी माना जाता था.

नवंबर 2021: गिरफ्तारी की कहानी

12 नवंबर 2021 को झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले में गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस ने कार्रवाई की. बताया गया कि एक गुप्त बैठक के लिए जा रहे थे. पुलिस ने घेराबंदी कर उन्हें पकड़ लिया. वे एक सफेद स्कॉर्पियो गाड़ी में थे. उनके साथ शीला मरांडी और चार अन्य कमांडर भी गिरफ्तार किए गए. बरामदगी में मोबाइल फोन, डिजिटल स्टोरेज डिवाइस और नकदी शामिल थी. 14 नवंबर को उन्हें अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

भीमा कोरेगांव केस: गंभीर आरोप

किशन दा का नाम भीमा-कोरेगांव एल्गार परिषद मामला में भी सामने आया. उन पर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश, माओवादी षड्यंत्र और फंडिंग के आरोप लगाए गए.हालांकि अभी तक यह आरोप साबित नहीं हुए हैं और मामला अदालत में विचाराधीन है.

2018 के बाद बदलाव

2018 में संगठन ने नेतृत्व में बदलाव किया और नए महासचिव बने नंबला केशव राव.गनपति और किशन दा को पीछे की भूमिका में रखा गया, लेकिन उनका प्रभाव बना रहा.

2024 से 2026: संपूर्ण नक्सल उन्मूलन 

हाल के वर्षों में माओवादी संगठन को कई झटके लगे. कई शीर्ष नेता मारे गए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं. लगातार सुरक्षा अभियानों से संगठन कमजोर हुआ है.

क्या गिरफ्तारी से टूटा नेटवर्क

किशन दा की गिरफ्तारी से संगठन को बड़ा झटका जरूर लगा. रणनीतिक नेतृत्व कमजोर हुआ और समन्वय प्रभावित हुआ. लेकिन जमीनी स्तर पर कैडर अब भी सक्रिय हैं और छोटे मॉड्यूल के रूप में काम जारी है.

किशनजी और किशन दा में अंतर

लोग अक्सर मल्लुजोला कोटेश्वर राव और प्रशांत बोस को एक ही समझ लेते हैं.किशनजी एक सैन्य कमांडर थे जबकि किशन दा राजनीतिक रणनीतिकार थे.

इंटेलिजेंस एजेंसियों का आकलन

एजेंसियों के अनुसार किशन दा भारत के सबसे बड़े माओवादी रणनीतिकारों में से एक थे. उन्हें विचारधारा का मुख्य स्तंभ और दीर्घकालिक रणनीति का निर्माता माना जाता था. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2006 में माओवाद को देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बताया था.

क्यों बने रहे अदृश्य

किशन दा कभी सार्वजनिक चेहरा नहीं बने. सुरक्षा कारणों से वे हमेशा अंडरग्राउंड रहे. संगठन में सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व अलग रखा गया था. इसी वजह से वे आम जनता के बीच लगभग अज्ञात रहे.

निष्कर्ष: अंत या बदलाव

किशन दा की गिरफ्तारी फिर मौत एक महत्वपूर्ण मोड़ है, लेकिन माओवादी आंदोलन का अंत नहीं.आज संगठन कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन उसकी विचारधारा और नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं.आने वाले समय में यह देखना होगा कि यह आंदोलन खत्म होता है या नए रूप में सामने आता है.

यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है क्योंकि अभी भी कई टॉप नक्सली सारंडा में डेरा जमाए बैठे हैं. अमित शाह ने संसद को जानकारी दी है कि नक्सलवाद खत्म हो चुका है लेकिन क्या सच में ये खत्म हो चुका है.

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