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पितृपक्ष : पितरों के श्राद्ध के पीछे क्या है रहस्य, आखिर गया में ही क्यों किया जाता है पिंडदान?

BY -
Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 6:14:19 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत आज यानि की 7 सितंबर से शुरू हो रही है. पितृपक्ष पितरों का श्रद्धा और तर्पण करने के लिए सबसे उचित समय माना गया है. इस दौरान पितरों का श्राद्ध किया जाता है और ऐसा माना जाता है कि इस दौरान हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और हमें आशीर्वाद देते हैं. वहीं पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि से हो जाती है. इस दिन को पूर्णिमा श्राद्ध के नाम से जाना जाता है. पितृपक्ष हिंदू धर्म में एक पवित्र और महत्वपूर्ण काल है, जो भाद्रपद माह की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन माह की अमावस्या तिथि यानि की 16 दिनों तक चलता है. यह काल पितरों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष के लिए समर्पित है, जिसमें श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्मकांड किए जाते हैं. शास्त्रों में इसे अशुभ काल माना जाता है, क्योंकि यह मृत्यु से जुड़े संस्कारों से जुड़ा है. गरुड़ पुराण के अनुसार, पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण से तीन पीढ़ियों के पूर्वजों को मोक्ष मिलता है. इसी दौरान पितरों का गया श्रद्धा या गया वास भी किया जाता है. गया श्राद्ध को सबसे उत्तम श्राद्ध क्रिया माना गया है. मान्यता यह भी है की गयाजी जाकर यह श्राद्ध कर्म करने से पितरों को काभी भटकना नहीं पड़ता है.

क्या है श्राद्ध के पीछे का रहस्य 
दरअसल ऐसा माना जाता है की पितृ पक्ष के समय हमारे पितर यानि की हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं. यी में पितृ पक्ष यह एक श्रद्धापूर्ण अनुष्ठान है जो दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए किया जाता है, जिससे परिवार को उनका आशीर्वाद मिलता है और जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं. पितृ पक्ष के दौरान, पूर्वजों की आत्माएं पृथ्वी पर आती हैं और परिवार द्वारा किए गए तर्पण (जल और भोजन का अर्पण) को स्वीकार करती हैं. यह पितरों के ऋण से मुक्ति पाने और घर में सुख-समृद्धि लाने का एक तरीका है. माना जाता है की पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धापूर्ण अनुष्ठान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. साथ ही हमें भी पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और पितरों के किए गए उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनसे जुड़े ऋण से मुक्ति पाने का एक अवसर है.

गया में पिंडदान का है खास महत्व

गया, बिहार में स्थित एक प्राचीन और पवित्र शहर है, जिसे 'मोक्ष की नगरी' के नाम से भी जाना जाता है. साथ फी इस जगह को हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दौरान पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थल माना गया है. लोगोंं की ऐसी मान्यता है कि गया में पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार की सात पीढ़ियों का उद्धार होता है. साथ ही विष्णु पुराण और वायु पुराण जैसे ग्रंथों में गया को 'मुक्ति की भूमि' कहा गया है. मान्यता यह भी है कि भगवान विष्णु स्वयं यहां पितृ देवता के रूप में विराजमान हैं और फल्गु नदी के तट पर स्थित गया में पिंडदान करने से न केवल पितरों को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है, बल्कि वंशजों को भी सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. इसके अलावा त्रेतायुग खुद भगवान श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान यहां किया था. यह स्थान इसलिए भी खास है क्योंकि यहां पिंडदान करने से 21 पीढ़ियों तक के पितरों को मुक्ति मिलने की मान्यता है.

पिंडदान से जुड़ी यह कथा मशहूर है : 
पुराणों के अनुसार, गयासुर एक शक्तिशाली और धार्मिक प्रवृत्ति का असुर था, जो भस्मासुर का वंशज माना जाता है. वह भगवान विष्णु का परम भक्त था और उसने अपनी कठोर तपस्या से भगवान विष्णु को प्रसन्न कर लिया. जब विष्णु जी ने गयासुर से वरदान मांगने को कहा, तो उसने एक अनोखा वरदान मांगा था. उसने वरदान मांगा 'जो कोई भी मेरे शरीर को स्पर्श करेगा, उसे सीधे स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी, चाहे वह पुण्यात्मा हो या पापी.' भगवान विष्णु ने उसकी भक्ति से प्रभावित होकर यह वरदान दे दिया. इस वरदान के कारण गयासुर के शरीर को छूने वाला हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी पापी क्यों न हो, स्वर्गलोक प्राप्त करने लगा. इससे यमलोक खाली होने लगा और संसार में पाप-पुण्य का संतुलन बिगड़ने लगा. यह देखकर देवता चिंतित हो गए और उन्होंने ब्रह्मा जी से इस समस्या का समाधान करने की प्रार्थना की. ब्रह्मा जी ने गयासुर के पास जाकर उनसे यज्ञ के लिए अपनी पवित्र देह दान करने का आग्रह किया. गयासुर ने बिना किसी संकोच के अपनी देह यज्ञ के लिए समर्पित कर दी और गयासुर ने यज्ञ के लिए अपने शरीर को भूमि पर लिटा दिया. देवताओं ने उनके शरीर पर यज्ञ संपन्न किया और भगवान विष्णु स्वयं उनके शरीर पर विराजमान हो गए. विष्णु जी ने गयासुर को वरदान दिया कि उनका शरीर पवित्र तीर्थ के रूप में अमर रहेगा और जो भी यहां सच्चे मन से पिंडदान करेगा, उसके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होगी. इसके बाद गयासुर का शरीर पत्थर में बदल गया और वह स्थान गया तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हो गया. भगवान विष्णु ने यह भी घोषणा की कि वे स्वयं यहां पितृ देवता के रूप में रहेंगे और फल्गु नदी के तट पर किए गए श्राद्ध कर्म को स्वीकार करेंगे.

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