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पितृपक्ष के 10वें दिन सिर और कूप में पिंडदान से नरक भोग रहे पितरों के लिए खुलता है मोक्ष का द्वार,पढ़े इसकी पौराणिक मान्यता

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
Published: September 16, 2025,
Updated: 2:40 AM

TNP DESK-हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है. पितृपक्ष में पितरों को याद कर उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और श्राद्ध किया जाता है. वहीं आज पितृपक्ष के ग्यारहवें और गया श्राद्ध के दसवें दिन, गया सिर और गया कूप में पिंडदान करने की परंपरा है. मान्यता है कि इन पवित्र पिंड वेदियों पर पिंडदान करने से पितरों को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है और वे सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त हो जाते हैं.

पितृपक्ष के 10वें दिन गया सिर और गया कूप में पिंडदान का विशेष महत्व है. माना जाता है कि इन दोनों स्थानों पर पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है, खासकर उन पितरों के लिए जो नरक में भोग रहे हैं.

गया सिर और गया कूप का महत्व

गया सिर विष्णुपद मंदिर से दक्षिण दिशा में स्थित है और यह विशेष रूप से उन पितरों के लिए महत्वपूर्ण है जो नरक में भोग रहे हैं.

गया कूप एक पवित्र स्थल है जहां पिंडदान और नारियल अर्पण करने से पितरों को मोक्ष मिलता है.

 इन दोनों स्थानों पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिलती है, जिससे परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है.

क्या है पौराणिक मान्यता

गया सिर और गया कूप की उत्पत्ति गयासुर राक्षस के सिर और नाभि से हुई है, जो भगवान विष्णु द्वारा वध किए गए थे.

इन स्थानों पर पिंडदान करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, जो पितरों को मोक्ष प्रदान करने में सहायक मानी जाती है.

पिंडदान का विधान

पितृपक्ष के 10वें दिन गया सिर और गया कूप में पिंडदान करने का विशेष विधान है.

 पिंडदान के बाद तीर्थयात्रियों को मां संकटा देवी के मंदिर में पूजा-अर्चना करने की सलाह दी जाती है, जिससे परिवार में सुख-शांति का बना रहता है. 

Tags:Pitru PakshaPitru Paksha 2025पिंडदान और श्राद्धपितृपक्षगया सिर और गया कूप का महत्व

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