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कांग्रेस की दुविधा या सुनियोजित चुप्पी साध नीतीश की बेसब्री की परीक्षा, आखिर विपक्षी एकता के मुद्दे पर अपना पत्ता क्यों नहीं खोल रही कांग्रेस

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 3:42:26 AM

पटना(PATNA):  पूर्णिया की महागठबंधन की रैली में सीएम नीतीश कुमार ने एक बार फिर से कांग्रेस से विपक्षी एकजुटता के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ने की अपील की है, सीएम नीतीश ने एक बार फिर इस बात को दुहराया है कि यदि विपक्षी खेमा एक हो गया तो भाजपा के लिए 100 सीटों का आंकड़ा भी पार करना मुश्किल होने वाला है, लेकिन इसके लिए जरुरी है कि कांग्रेस विपक्ष की एकजुटता के लिए अपने प्रयास को तेज करे.

कांग्रेस अपनी चुप्पी को तोड़ने को तैयार नहीं

यहां हम बता दें कि इसके पहले ही सीएम नीतीश कांग्रेस से विपक्षी एकता के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ने का आग्रह कर चुके हैं, तब भी उन्होंने कहा था कि यदि हम साथ आये तो 2024 की लड़ाई बहुत मुश्किल नहीं होने वाली है. बावजूद इसके कांग्रेस अपनी चुप्पी को तोड़ने को तैयार नहीं है.

छत्तीसगढ़ सम्मेलन में विपक्षी एकता पर कोई चर्चा नहीं

पहले यह माना जा रहा था कि छत्तीसगढ़ सम्मेलन के बाद कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ेगी और विपक्ष को एकजुट करने की किसी कार्ययोजना के साथ सामने आयेगी. लेकिन अब छत्तीसगढ़ सम्मेलन भी समाप्त हो चुका है, बावजूद इसके कांग्रेस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही है, और ना ही छत्तीसगढ़ में विपक्ष की एकता के मुद्दे पर कोई राजनीतिक चर्चा ही हुई.

इतनी सरल नहीं है नीतीश की रणनीति और उनकी मांग

नीतीश कुमार की मांग और उनकी राजनीति को समझने वालों का मानना है कि विपक्ष की एकता की मांग बाहर से जितनी सरल और सीधी दिखती है, दरअसल वह अन्दर से उतना ही उलक्षा है. मामला सिर्फ विपक्ष की एकता का नहीं है, समस्या यह है कि विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा, पीएम चेहरा कौन होगा.

पीएम पद के चेहरे पर फंसा है पेच

नीतीश की विपक्षी एकता की मांग के बाद जिस प्रकार से तेजस्वी यादव ने ड्राइविंग सीट पर किसी क्षेत्रीय दल को बिठाने की मांग की है, वह और कुछ नहीं नीतीश कुमार की ही रणनीति का विस्तार है. इस मांग के साथ ही नीतीश की रणनीति और उनकी राजनीतिक महात्वाकांशा साफ हो जाता है. दरअसल नीतीश की रणनीति यह है कि कांग्रेस उन्हे पीएम पद का चेहरा घोषित करे. उनकी समझ यह है कि ज्योहीं कांग्रेस उन्हें पीएम का चेहरा स्वीकार कर करती है, दूसरे क्षेत्रीय दलों से समर्थन मांगना आसान हो जायेगा.

नीतीश की मांग को स्वीकार करना कांग्रेस के लिए जहर पीने के समान

लेकिन यह मांग तो कांग्रेस लिए जहर पीने के समान है, क्योंकि जब राहुल गांधी अकले भाजपा का मुकाबला कर रहे थें, तब तो नीतीश कुमार भाजपा के साथ सत्ता का सुख का आनन्द ले रहे थें, और अब जब कि लड़ाई कुछ हद तक आसान होती दिख रही है, कांग्रेस इस अवसर को गंवाना नहीं चाहती, यही कांग्रेस के रणनीतिकारों की दुविधा और परेशानी का सबब है.

भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी का क्रेज बढ़ा

और खास कर तब जब भारत जोड़ो यात्रा के बाद देश की बड़ी आबादी में राहुल गांधी का क्रेज बढ़ा है, उनकी रैलियों और पदयात्रा में लोगों की भीड़ जुटने लगी है, उनकी पहचान देश के एक कोने से दूसरे कोने तक है, यही कारण है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर अभी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हो रही है.

विपक्ष के अन्दर के विपक्ष को समझने की रणनीति

दरअसल कांग्रेस की रणनीति अभी विपक्ष के अन्दर के विपक्ष को समझने की है, यानी उसकी कोशिश अभी इस मामले को कुछ और टालने की है , जिससे की यह साफ हो सके कि गैर भाजपाइ दलों में  कौन-कौन  राहुल गांधी को पीएम पद का चेहरा स्वीकार करने की स्थिति में है और यही देरी नीतीश कुमार को खाये जा रही है, वह तो जल्द से जल्द तेजस्वी यादव की ताजपोशी कर बिहार से बाहर निकलना चाहते हैं, ताकी 2024 की लड़ाई का श्रीगणेश किया जाय.

Tags:Nitish DemandNitish pm FaceCongressNitish demand form congress

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