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जातिगत गणना रोकने वाली याचिका को ‘प्रचार याचिका’ करार दिये जाने पर गदगद नजर आये नीतीश कुमार, इशारों ही इशारों में भाजपा को घेरा

BY -
Prakash Tiwary
Prakash Tiwary
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 15, 2026, 5:04:00 PM

पटना(PATNA): जातीय जनगणना को रोकने वाली याचिका को देश की सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा ‘प्रचार हित याचिका’ करार दिये जाने पर बिहार के मुख्यमंत्री बेहद गदगद नजर आ रहें हैं. इस मामले में अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा है कि कुछ लोग जातिगत गणना के खिलाफ साजिश रच रहे थें, तरह-तरह की अफवाहें फैलायी जा रही थी. आखिरकार लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हे रास्ता दिखा दिया.

जाति सर्वेक्षण की अधिसूचना को रद्द करने की मांग

यहां बता दें कि याचिकाकर्ता ने जाति सर्वेक्षण की अधिसूचना को रद्द करने की मांग की थी, याचिकाकर्ता का तर्क था कि भारतीय संविधान में जाति कोई चर्चा ही नहीं है. जातीय गणना अवैध और भेदभावपूर्ण है और संविधान की मूलभावना के खिलाफ है. याचिकाकर्ता का कहना था कि जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 3 के अनुसार, केंद्र को भारत के पूरे क्षेत्र या किसी भी हिस्से में जनगणना करने का अधिकार है. कानून में जातिगत जनगणना पर विचार नहीं किया गया है और राज्य सरकार के पास जाति जनगणना करने के लिए कानूनी अधिकार है. यह एक अवैध प्रयास है. 6 जून, 2022 की अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.

याचिका में कोई मेरिट नहीं- कोर्ट

यहां बता दें कि शीर्ष अदालत ने इसे "प्रचार हित याचिका" कहते हुए सवाल किया कि याचिकाकर्ता के द्वारा इस मामले में पटना उच्च न्यायालय दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया गया? कोर्ट ने कहा कि यह तो एक प्रचार हित याचिका नजर आती है, किस जाति को कितना आरक्षण दिया जाय, इस बारे में हम कैसे कोई दिशा निर्दश जारी कर सकतें है, जस्टिस बीआर गवई और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि याचिकाओं में कोई दम नहीं है, लिहाजा इन्हें खारिज किया जाता है. पीठ ने छूट दी कि याचिकाकर्ता संबंधित उच्च न्यायालय का रुख कर सकते हैं.

तीन याचिकाओं पर एक साथ हुई थी सुनवाई

यहां बता दें कि सुप्रीम कोर्ट जातीय जनगणना के मुद्दे पर एक साथ तीन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था. तीन में एक याचिका एक गैर-सरकारी संगठन के द्वारा दाखिल किया गया था, दूसरी याचिका अखिलेश कुमार के द्वारा दायर की गयी थी, जबकि तिसकी याचिका हिंदू सेना नामक संगठन के द्वारा दायर की गयी थी. हिंदू सेना का आरोप था कि जातिगत जनगणना करवा कर बिहार सरकार देश की एकता और अखंडता को तोड़ना चाहती है, लेकिन तीनों ही याचिकायें सुप्रीम कोर्ट के द्वारा खारिज कर दी गयी.

भाजपा को निशाने पर क्यों ले रहे हैं नीतीश कुमार

दरअसल जब केन्द्र सरकार के द्वारा जातीय जनगणना से इंकार किया गया था, तब नीतीश कुमार भाजपा के साथ ही सरकार में थें और उसी समय नीतीश कुमार के द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया था कि बिहार सरकार जातीय जनगणना अपने संसाधनों से करने पर विचार कर रही है. उस समय भी नीतीश कुमार को इस मुद्दे पर राजद का साथ मिला था, यही कारण है कि जब नीतीश कुमार इस मुद्दे पर केन्द्र सरकार से मिलकर जातीय जनगणना की मांग कर रहे थें, तब आज के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव में उनके साथ दिल्ली गये थें, साथ में भाजपा के प्रतिनिधिमंडल भी इसका हिस्सा था.

राजद और जदयू का आरोप जातीय जनगणना का अन्दरखाने विरोध कर रही थी भाजपा

लेकिन भाजपा की दुविधा यह थी कि बिहार की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यहां तो जातीय जनगणना का उपरी तौर पर समर्थन कर रही थी, लेकिन  पूरे देश के स्तर पर जातीय गणना से इंकार रही थी, और इसी से जातीय जनगणना के मुद्दे पर भाजपा की दुविधा जगजाहिर हो रहा था.

दरअसल जदयू और राजद का मानना है कि राजनीतिक हालत और समीकरण को देखते हुए बिहार में भाजपा जातीय जनगणना की मांग में शामिल थी, लेकिन अन्दरखाने वह इसके विरोध में काम रही थी. नीतीश कुमारा अपने इशारों में इसी का जिक्र कर रहें थें, दरअसल वह इन तीनों याचिकाकर्ताओं को भाजपा से जोड़ कर देख रहे थें.

रिपोर्ट: देवेन्द्र कुमार

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