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गिरिडीह में नड्डा साहब की हुंकार, क्या आजसू को चिंता में डाल गए या सौगात दे गए ?

BY -
Aditya Singh
Aditya Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 3:51:49 AM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK):-लोकसभा चुनाव के जैसे -जैसे दिन नजदीक आते जा रहें हैं. वैसे -वैसे सियासी दलों की सरगर्मी भी तेज होती जा रही है. इसकी तपिश से चुनावी महासंग्राम दिलचस्प होने वाला है.राजनीति की बिसात पर एकतरफा भाजपा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस और महागठबंधन. सब अपने-अपने मुक़म्मल तैयारी को अंजाम देने में लगे हुए है. दिल्ली से हटकर राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी छोटे-छोटे शहरों में दिखने लगी है. जो बानगी है कि दिल्ली की सत्ता हासिल करना कितना कीमती है.लाजमी है की दिल्ली जीतने की तमन्ना और बेकरारी किस कदर हावी हो रही है. खासकर, भाजपा के लिए ये चुनाव चुनौतीपूर्ण होने वाली है. क्योंकि लगातार NDA की ये तीसरी विजय होगी.

गिरिडीह में जेपी नड्डा की हुंकार

बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा हाल में ही गिरिडीह का दौरा करना इसी की एक कड़ी के तौर पर देखा जा सकता है. राजधानी रांची, जमशेदपुर, धनबाद की बजाय गिरिडीह आना और विरोधियों पर गरज कर चल देना. कई तरह के सवाल और इशारे कर रहा है. सवाल है कि गिरिडीह ही इतनी मुफीद जगह क्यों हो गई, और कोई दूसरी जगह को क्यों नहीं चुना  गया. यहां इशारा बीजेपी के साथ गठबंधन की हुई आजसू तो नहीं है. क्योंकि गिरिडीह लोकसभा की सीट से आजसू के चंदप्रकाश चौधरी सांसद 2019 में चुने गए थे. सवाल ये भी सिर उठाये हुए है कि, क्या आजसू के साथ गठबंधन बीजेपी लोकसभा चुनाव में नहीं करेगी. अगर सचमुच बीजेपी का यही मकसद है तो मुश्किल आजसू को ज्यादा होगी. क्योंकि बीजेपी का साथ मिलने पर ही गिरिडीह का आवाम वोट उन्हें किया था. नहीं तो आजसू के लिए अकेले चुनाव जीत जाना उतना आसान नहीं था.

गिरिडीह रहा है बीजेपी का गढ़

अगर गौर से सोचे और समझे तो गिरिडीह में बीजेपी का वर्चस्व रहा है. 1996 से 2014 तक बीजेपी ही विजय रही हैं. सिर्फ 2004 में जेएमएम के टेकलाल महतो ने जीत दर्ज की थी. नहीं तो बीजेपी से रविंद्र पाण्डेय यहां रिकॉर्ड जीत दर्ज कर इतिहास रचा हैं. हालंकि, रविंद्र पाण्डेय को 2019 में गिरिडीह सीट से नहीं उतारा गया था. 
आजसू को नड्डा साहब का गिरिडीह आना खटक रहा हैं. अंदर -अंदर उनकी चिंता गहराती जा रही है. क्योंकि, उसे डर है की अगर  गिरिडीह से बीजेपी खुद ही अपना उम्मीदवार उतार दे, तो मुश्किलें बढ़ेगी.अगर 2019 की बात को समझे तो आजसू -बीजेपी का मिलन भी बेमतलब ही था. क्योंकि इसमे फायदा बीजेपी से ज्यादा आजसू को हुआ. भाजपा ने गठबंधन ये सोचकर किया था कि इसका फायदा झारखण्ड विधानसभा चुनाव में होगा. वो तो हुआ ही नहीं.2020 के विधानसभा चुनाव में आजसू और बीजेपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. इसके चलते बीजेपी को हार झेलनी पड़ी थी.

बीजेपी का मकसद

इसबार बीजेपी का पहला मकसद विधानसभा की बजाय लोकसभा है. क्योंकि, हर हाल में वह इसे जीतना चाहती है. गिरिडीह में खुद चुनाव लड़ने के मूड इसलिए बनता हुआ दिखाई पड़ता है कि, इसबार अपनी पार्टी के सांसदों की संख्या बढ़ानी है. क्योंकि अगर कहीं संख्या बल कम भी पड़े तो उसकी भरपाई हो जाए.

क्यों बीजेपी कें लिए आजसू है अहम?

 इधर दूसरा पहलू ये भी है कि, वो आजसू के साथ गठबंधन न तोड़े. वो नहीं चाहेगी की, किसी तरह की अड़चन दिल्ली की सत्ता हासिल करने में हो. लिहाजा, उसी लाड़ -दुलार और प्यार से आजसू के साथ मिलकर चुनाव भी लड़ सकती है. आजसू बीजेपी के लिए अहम नहीं मजबूरी भी हो सकती है. वो इसलिए भी है क्योंकि, झारखण्ड के कुर्मी -कोइरी और महतो वोट पर अच्छी पकड़ है. झारखण्ड में करीब 17 प्रतिशत इनकी भागीदारी है.लिहाजा वह ये नहीं चाहेगी कि गिरिडीह कें चलते आजसू उससे छिटकें. नहीं तो झारखण्ड की बाकी लोकसभा सीट पर भी भाजपा को इसका खामियाजा भुगतान पड़ सकता है. शायद, इसबार बीजेपी कहीं एक की बजाय कहीं ज्यादा सीट आजसू को लोकसभा चुनाव में न दे दें.

कयासों का बाजार गर्म

वैसे बीजेपी की तरफ से गिरिडीह सीट से कई नाम भी कयासों के बाजार में चुनाव लड़ते नजर आ रहें  है. जिसमें बाघमारा के बीजेपी विधायक ढुल्लु महतो, झारखण्ड विधानसभा के विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी का नाम शामिल है. हालांकि वक़्त ये तय करेगा कि,कौन उम्मीदवार यहां से उतरेगा. अभी जीतने नाम हैं, वे ऊपर -ऊपर ही और मुहजुबानी हैं.

चंद्रप्रकाश चौधरी की चिंता!

ये तो तय है कि,बीजेपी अगर गिरिडीह से खुद लड़ेगी तो चंद्रप्रकाश चौधरी की चिंता बढ़ेगी. क्योंकि उन्हें भी पता हैं. अकेले गिरिडीह से जितना उनके लिए उतना आसान नहीं होनेवाला हैं. इसके साथ ही अपने सांसदी के दौरान क्या काम किया हैं और क्या काम नहीं किया है?. इसका हिसाब करके ही जनता वोट करेगी.

खैर चुनाव के नजदीक आते -आते कई चिज़े बदलेंगी, कई समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे. समय के साथ प्रत्याशी की तस्वीर और सियासत की तासीर भी मालूम पड़ जाएगी. इसके साथ ही आजसू और बीजेपी का गठबंधन अटूट रहेगा या टूट जाएगा. ये भी पता चल जायेगा.
तब तक हमे वक़्त के बीतने का इंतजार करना चाहिए.क्योंकि ये वक़्त ही सबकुछ तय करेगा.

रिपोर्ट - शिवपूजन सिंह

 

 

 

 

 

 

 

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