टीएनपी डेस्क (TNP DESK): आज की सुबह पश्चिम बंगाल क लिए कुछ अलग रही. अब बंगाल की धरती सचमुच भगवा हो चुकी है और वहाँ के लोगों की ज़बान पर जय श्री राम का नारा साफ सुनाई दे रहा है. चुनाव परिणामों के बाद आने वाले यह नए दिन बंगाल की किताब में एक नया इतिहास रचने को तैयार खड़े हैं. ऐसे में बंगाल चुनाव में जितनी चर्चा भाजपा की रही, उससे अधिक ध्यान बटोरा उस दिल दहला देने वाली घटना ने जिससे सभी स्तब्ध थे. बात हो रही है कलकत्ता के सरकारी आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की जहां 31 वर्षीय एक पीजीटी महिला डॉक्टर, जो अपनी चेस्ट मेडिसिन विभाग में नाइट ड्यूटी पर थी, उसके साथ जघन्य अपराध को अंजाम दिया गया था.
आरोपी की हैवानियत यहीं नहीं रुकी और इस दरिंदगी के बाद महिला डॉक्टर का शव 9 अगस्त की सुबह अस्पताल के सेमिनार हॉल में अर्ध-नग्न अवस्था में मिला था. वहीं पोस्टमार्टम से इस बात की पुष्टि हुई कि पीड़ित साथ यौन उत्पीड़न (rape) किया गया था और फिर उनकी गला दबाकर हत्या की गई. उनके शरीर के विभिन्न हिस्सों पर गंभीर चोट के निशान भी थे. इसके बाद करीबन 164 दिनों की कानूनी लड़ाई के बाद, कोर्ट ने मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई.
पर कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से जुड़े चर्चित मामले ने न सिर्फ राज्य बल्कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा. इस घटना ने कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा और शासन की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे, जिसके बाद बंगाल चुनाव में नया मोड आया और शायद यही वजह रही की Iron Lady ममता बनर्जी का साम्राज्य आज खत्म हो गया है. यह शिकस्त ऐसी यही की अपनी सत्ता तो दूर, बल्कि ममता दीदी तो अपनी भवानीपुर सीट तक नहीं बचा सकीं.
इस केस को लेकर जनता में गुस्सा और असंतोष साफ नजर आया, जिसका असर चुनावी माहौल पर भी पड़ा. लंबे समय से सत्ता में बनी ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ इस मुद्दे को विपक्ष ने जोर-शोर से उठाया. आरोप लगाए गए कि राज्य में कानून व्यवस्था कमजोर हो रही है और आम लोगों, खासकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भरोसा कम हुआ है. चुनाव प्रचार के दौरान यह मामला एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया और विपक्षी दलों ने इसे सरकार की नाकामी का उदाहरण बताया. इससे जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई, कि अब बंगाल में बदलाव जरूरी है. हालांकि सत्तारूढ़ दल ने अपने स्तर पर कार्रवाई और जांच की बात कही, लेकिन विरोध की आवाजें थमती नहीं दिखीं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना ने मतदाताओं की सोच को प्रभावित किया. खासकर युवा वर्ग और महिला मतदाताओं के बीच इस मुद्दे पर गहरी चर्चा देखने को मिली. कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन और न्याय की मांग को लेकर आवाजें उठीं, जिसने चुनावी माहौल को और संवेदनशील बना दिया. हालांकि, चुनाव सिर्फ एक घटना के आधार पर तय नहीं होते, लेकिन इस तरह के मामलों का जनभावनाओं पर गहरा असर पड़ता है. शायद यही वजह रही की अभया( सांकेतिक नाम) की मां रत्ना देबनाथ, जो इस लड़ाई में मुख्य चेहरा बनीं, ने 2026 में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पानीहाटी सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल कर ली. ऐसे में अब 2026 के बंगाल में कथित गुंडाराज का दौर खत्म हो चुका है और अब वहाँ की जनता खुल कर सांस ले सकती है.