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Mahalaya 2025: पितरों और माता दुर्गा का है ख़ास कनेक्शन, जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा के साथ तर्पण का शुभ मुहूर्त 

BY -
Priyanka Kumari CE
Priyanka Kumari CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 10:16:03 AM

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): जिस तरह से हमारे सनातन धर्म में पितृपक्ष का महत्व है उसी तरीके से इसकी सबसे अंतिम तिथि यानी तर्पण का दिन भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है इस दिन हम अपने पितरों को तर्पण अर्पित करते है. वही यह दिन माता दुर्गा से भी काफी ज्यादा जुड़ा है क्योंकि पितृ पक्ष खत्म होने के साथ ही महालया नवरात्रि की शुरुआत का दिन भी है इसलिए खास माना जाता है.साल 2024 में अमावस्या महालया 21 सितंबर को पड़ेगा.महलया भी अपने आप में खास है क्योंकि 14 दिनों के पितृपक्ष के बाद हम अपने पितरों को तर्पण अर्पित करते है और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते है.

 पितृपक्ष के खत्म होने के साथ ही शुरू हो जाती है दुर्गा पूजा की तैयारी

महालय को लेकर पुरानी मान्यता है कि मां दुर्गा इस दिन कैलाश पर्वत से पृथ्वी पर अपने भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए पधारती है.चलिए साल 2025 के महालया की सही तिथि पूजा की सही विधि और माता दुर्गा से महालया का क्या कनेक्शन है इसके बारे में जान लेते है.

पितरों और माता दुर्गा का है ख़ास कनेक्शन

आपको बता दे कि अमावस्या का प्रारंभ- 21 सितंबर 2025, सुबह 12:16 से होगा जो 22 सितंबर 2025, सुबह 1:23 तक रहेगा.पुरानी मान्यता है कि महालया के दिन हमें पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ अपने पितरों की पूजा अर्चना करनी चाहिए और आशीर्वाद मांगना चाहिए.वही उनके नाम पर दान पुण्य और गरीबों को भोजन कराना चाहिए. आप चाहें तो पंडितों को भी भोजन करा सकते है. इसके अलावा आपके पितरो को मोक्ष की प्राप्ति होती है.वही आपके ऊपर अपना आशीर्वाद बनाए रखता है.जिससे आपका जीवन खुशहाल चलता है.

माता दुर्गा इस दिन पूरे परिवार के साथ पृथ्वी पर आती है

आपको बता दे कि महालया केवल पितरों के तर्पण का दिन ही नहीं है बल्की यह वह शुभ दिन होता है, जब माता दुर्गा अपने पुरे परिवार के साथ पृथ्वी लोक पर आती है.वही ये वो खास दिन होता है जिस दिन मूर्तिकार माता दुर्गा की मूर्ति को अंतिम रूप देते है और आँखों का चित्र बनाते है.

पढे क्या है महालया की पौराणिक कथा

वही महालया से जुड़ी एक पौराणिक कथा है जो महाभारत से जुड़ी है.आप सभी ने दानवीर कर्ण के बारे में जरूर सुना होगा जो काफी दानी थे और किसी को भी खाली हाथ नहीं लौटते थे सब कुछ दान किया करते थे, लेकिन जब वह मृत्यु के बाद स्वर्गलोक पहुंचें तो वहां उन्हें भोजन के रूप में थाली में सोने चांदी और रत्नों से भरा थाल सजा कर दिया गया जब कारण पूछा तो बताया गया की अनहोन दान तो बहुत किया लेकिन अपने पितरों को ना तो अनाज और ना ही पानी दिया.वही दानवीर ने मृत्यु के देवता यमराज से 15 दिन का समय मांगा और कहा कि मैं पृथ्वी पर जाना चाहता हूं और अपने पितरों का तर्पण करना चाहता हूं.यमराज ने प्रसन्न होकर उन्हें 15 दिन की मोहलत दी जिसके बाद कर्ण धरती पर आए और अपने पितरों का तर्पण किया तब से लेकर आज तक यह 15 दिन पितृपक्ष के रूप में लोग मानते है और अपने पितरों का तर्पण करते है.

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