टीएनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड में लंबे समय से खाली पड़े संवैधानिक पदों में से एक लोकयुक्त पद को लेकर अटकलें अब खत्म होने जा रही हैं. यानि की अब राज्य को जल्द ही लोकयुक्त मिलने वाला है, जिसे लेकर हालही में हाई कोर्ट में सुनवाई हुई है. सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य में लोकायुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले पर विस्तृत चर्चा की है.
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने अदालत को जानकारी दी कि इन पदों पर नियुक्ति के लिए चयन प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है. उन्होंने बताया कि चयन समिति की बैठक हो चुकी है और उसमें नामों पर विचार-विमर्श किया गया है. सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि सात अप्रैल तक नियुक्तियों से संबंधित अधिसूचना जारी कर दी जाएगी.
महाधिवक्ता ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री फिलहाल राज्य से बाहर हैं, जिसके कारण औपचारिक निर्णय की घोषणा में थोड़ी देरी हुई है. हालांकि, उन्होंने भरोसा दिलाया कि चयन समिति के निर्णय से अदालत को जल्द अवगत करा दिया जाएगा. इस पर अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को तय कर दी.
झारखंड में लोकायुक्त, राज्य मानवाधिकार आयोग, राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों के पद लंबे समय से रिक्त हैं. इन पदों के खाली रहने से प्रशासनिक कार्यों पर असर पड़ रहा है और आम जनता को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े तंत्र कमजोर पड़ते जा रहे हैं.
क्या होता है लोकायुक्त
लोकायुक्त राज्य स्तर पर नियुक्त एक स्वतंत्र संस्था होती है, जिसे आमतौर पर सरकार के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए बनाया जाता है. इसे भारतीय व्यवस्था में ओम्बुड्समैन के रूप में भी जाना जाता है. लोकायुक्त का मुख्य कार्य सरकारी अधिकारियों और लोक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार या दुरुपयोग से जुड़े मामलों की जांच करना होता है.
लोकायुक्त का उद्देश्य शासन में पारदर्शिता लाना, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखना और आम जनता की शिकायतों का निष्पक्ष समाधान सुनिश्चित करना है. ऐसे में इन पदों का लंबे समय तक खाली रहना प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बना हुआ है.
कौन बन सकता है लोकायुक्त
लोकायुक्त के पद पर वही व्यक्ति नियुक्त किया जा सकता है, जिसने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो. यह पद काफी स्वतंत्र होता है. एक बार नियुक्ति होने के बाद सरकार सीधे तौर पर लोकायुक्त को न तो हटा सकती है और न ही उसका तबादला कर सकती है. उसे केवल राज्य विधानसभा द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पारित कर ही पद से हटाया जा सकता है.
लोकायुक्त का मुख्य कार्य भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और सार्वजनिक पदाधिकारियों द्वारा किए गए गलत कार्यों की जांच करना है. इसके दायरे में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, राज्य मंत्री, विपक्ष के नेता, सचिव स्तर और उससे ऊपर के अधिकारी शामिल होते हैं.
क्या होता है लोकायुक्त का काम
लोकायुक्त को जांच के दौरान कई अधिकार प्राप्त होते हैं. वह किसी भी सरकारी अधिकारी या लोकसेवक से पूछताछ कर सकता है, संबंधित दस्तावेजों की जांच कर सकता है और आवश्यकता पड़ने पर तलाशी तथा बरामदगी की कार्रवाई भी कर सकता है. आमतौर पर वह शिकायत मिलने या विश्वसनीय सूचना के आधार पर जांच शुरू करता है, लेकिन कुछ मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर भी कार्रवाई कर सकता है.
ऐसे में यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो लोकायुक्त अपनी रिपोर्ट संबंधित सक्षम प्राधिकारी को सौंपता है. इसके बाद उस प्राधिकारी को तीन महीने के भीतर कार्रवाई की जानकारी देनी होती है. यदि लोकायुक्त उस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं होता, तो वह अपनी विशेष रिपोर्ट राज्यपाल को भेज सकता है.