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जोशीमठ के घरों में पड़ने लगी दरारें, 60 से ज्यादा परिवारों को छोड़ना पड़ा शहर, मौसम की अलग मार, कौन जिम्मेवार?   

BY -
Prakash Tiwary
Prakash Tiwary
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 11:49:06 PM

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): जोशीमठ एक तरफ जहां भूस्खलन की मार झेल रहा है. वहां रहने वाले लोगों के घरों के मकान में दरार पड़ने लगी है. सरकार राहत बचाव कार्य में लग चुकी है. वहीं अब एक नई मुसीबत सामने आ गई है. मौसम विभाग के अनुसार जोशीमठ में बारिश के आसार हैं. इससे वहां भूस्खलन और दरार पड़ने का खतरा और बढ़ जाएगा. मौसम विभाग के अनुसार 11 और 12 जनवरी को बारिश हो सकती है.    

बता दें कि भूस्खलन के कारण जोशीमठ में दरार पड़ने लगा. वहां के पहाड़ों से पानी का रिसाव होने लगा. इससे स्थानीय आबादी को घबराहट होने लगी और उन्होंने विरोध शुरू किया. बता दें कि बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब की यात्रा करने वाले पर्यटकों के लिए जोशीमठ एक महत्वपूर्ण पारगमन बिंदु है. यहीं से होकर लोग बद्रीनाथ के दर्शन को आगे जाते हैं. जोशीमठ को भूस्खलन-धराशायी क्षेत्र घोषित किया गया है और इस डूबते हुए शहर में रहने वाले 60 से अधिक परिवारों को अस्थायी राहत केंद्रों में पहुंचाया गया है.

जोशीमठ कहां स्थित है?

जोशीमठ उत्तराखंड के चमोली जिले में ऋषिकेश-बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-7) पर स्थित एक पहाड़ी शहर है. यह शहर एक पर्यटक शहर के रूप में कार्य करता है क्योंकि बद्रीनाथ, औली, फूलों की घाटी और हेमकुंड साहिब के साथ राज्य के अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटन स्थलों में जाने वाले लोग रात भर के यहां विश्राम करते हैं. जोशीमठ भारतीय सेना के लिए भी बहुत सामरिक महत्व रखता है और यहां सेना की सबसे महत्वपूर्ण छावनियों में से एक स्थित है. यह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों या मठों में से एक है. ये चारों मठ कर्नाटक में श्रृंगेरी, गुजरात में द्वारका, ओडिशा में पुरी और उत्तराखंड में बद्रीनाथ के पास जोशीमठ हैं.

जोशीमठ क्यों डूब रहा है?

उत्तराखंड के चमोली जिले में लगातार भूस्खलन और बाढ़ आ रही थी. जिसके बाद जोशीमठ में दीवारों और इमारतों में दरारें पहली बार 2021 में दर्ज की गईं. रिपोर्टों के अनुसार, उत्तराखंड सरकार के विशेषज्ञ पैनल ने 2022 में पाया कि जोशीमठ के कई हिस्से मानव निर्मित और प्राकृतिक कारकों के कारण "डूब" रहे हैं. यह पाया गया कि उपसतह सामग्री के हटाने या विस्थापन के कारण पृथ्वी की सतह धीरे-धीरे डूबने लगी है. इससे शहर के लगभग सभी वार्डों में संरचनात्मक दोष हो गए.

भूस्खलन का कारण

1976 की मिश्रा समिति की रिपोर्ट के अनुसार जोशीमठ रेत और पत्थर के जमाव पर स्थित है. यह मुख्य चट्टान पर नहीं है. यह एक प्राचीन भूस्खलन पर स्थित है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अलकनंदा और धौलीगंगा की नदी धाराओं द्वारा कटाव भी भूस्खलन लाने में अपनी भूमिका निभा रहा है. समिति ने भारी निर्माण कार्य, ब्लास्टिंग या सड़क की मरम्मत के लिए बोल्डर हटाने और अन्य निर्माण, पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी. इसके साथ ही इस क्षेत्र में बिखरी हुई चट्टानें पुराने भूस्खलन के मलबे से ढकी हुई हैं, जिसमें बोल्डर, गनीस चट्टानें और ढीली मिट्टी शामिल हैं, जिनकी कम असर क्षमता है. ये गनीस चट्टानें अत्यधिक अपक्षयित होती हैं और विशेष रूप से मानसून के दौरान पानी के उच्च दबाव से रिसने लगती हैं. इसके साथ ही इस क्षेत्र में कन्स्ट्रक्शन में वृद्धि, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट और राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण ने पिछले कुछ दशकों में ढलानों को अत्यधिक अस्थिर बना दिया है. इसके अलावा विष्णुप्रयाग से बहने वाली धाराओं के कारण और प्राकृतिक धाराओं के साथ-साथ खिसकना शहर के दुर्भाग्य का एक और अन्य कारण है.

इसका क्या प्रभाव हुआ?

इस भूस्खलन का प्रभाव ये हुआ कि कम से कम 66 परिवार शहर छोड़कर चले गए हैं, जबकि 561 घरों में दरारें आने की सूचना है. एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि अब तक 3000 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं.

जोशीमठ को बचाने के लिए क्या किया जा सकता है?

जोशीमठ को बचाने के लिए विशेषज्ञ क्षेत्र में विकास और पनबिजली परियोजनाओं को पूरी तरह से बंद करने की सलाह देते हैं. लेकिन तत्काल आवश्यकता है कि निवासियों को एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए और फिर बदलते भौगोलिक कारकों को समायोजित करने के लिए शहर की प्लानिंग करने पर विचार की जाए. शहर का ड्रेनेज स्कीम भी इसके लिए बड़ा जिम्मेवार है. शहर खराब जल निकासी और सीवर प्रबंधन से पीड़ित है. क्योंकि अधिक से अधिक कचरा मिट्टी में रिस रहा है, जो इसे भीतर से ढीला कर रहा है. राज्य सरकार ने सिंचाई विभाग को इस मुद्दे पर गौर करने और जल निकासी व्यवस्था के लिए एक नई योजना बनाने के लिए कहा है. विशेषज्ञों ने मिट्टी की क्षमता को बनाए रखने के लिए विशेष रूप से संवेदनशील स्थलों पर क्षेत्र में पुनर्रोपण का भी सुझाव दिया है. जोशीमठ को बचाने के लिए सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) जैसे सैन्य संगठनों की सहायता से सरकार और नागरिक निकायों के बीच एक समन्वित प्रयास की आवश्यकता है. इसके सतह ही राज्य में पहले से ही मौसम पूर्वानुमान तकनीक है जो लोगों को स्थानीय घटनाओं के बारे में चेतावनी दे सकती है, इसके कवरेज में सुधार की आवश्यकता है.

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