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जंग देशों के बीच हो रहा या नेताओं की प्रतिष्ठा के बीच? जवाब जानकार आप हो जायेंगे हैरान!

BY -
Diksha Benipuri
Diksha Benipuri
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: April 2, 2026, 4:44:45 PM

TNP DESK- जब भी दुनिया मे काही जंग छिड़ता है तो खबरों में सबसे पहले देश का नाम आता है. कौन किस्से लड़ रहा है, किसकी सेना ज्यादा मजबूत है, कौन हार रहा है? लेकिन अगर थोड़ी और गहराई में जाएंगे तो ये सवाल जरूर आएगा आपके दिमाग में कि क्या ये जंग सच में देश लड़ रहे या कुछ नेताओं की मान की लड़ाई होती है?

इतिहास में देखा जाए तो कई बड़े युद्ध सीधे-सीधे राष्ट्रहित से ज्यादा सत्ता, प्रतिष्ठा और नियंत्रण की लड़ाई रहे हैं. आम जनता शांति चाहती है, लेकिन जब बात फैसले की आती है तो सिर्फ गिने चुने ही ले सकते हैं. यही है कि इसका सबसे बड़ा खमियाना आम लोगों को भुगतना पड़ता है. आम जनता सिर्फ एक ही चीज चाहती है शांति जोकि वो भी नहीं मिल पता उन्हे. घर टूटते हैं, ज़िंदगी बिखरती है, और भविष्य अनिश्चित हो जाता है.

आज के समय में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है.अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब तनाव  बढ़ जाता है तो अक्सर उसके पीछे राजनीतिक चर्चा पावर बैलेंस ग्लोबल इनफ्लुएंस की होड़ होती है. देश की सुरक्षा और हित जरूर एक मुद्दा है लेकिन कई बार नेताओं की इज्जत प्रतिष्ठा भी फसलों को प्रभावित करती है. 

अब सोचने वाली बात यह है कि क्या हर लड़ाई ताली नहीं जा सकती ?क्या डिप्लोमेसी बातचीत और समझदारी से हालात संभाले नहीं जा सकती? बहुत बार जवाब हां में ही होती है, लेकिन जमीनी हकीकत में प्रतिष्ठा और दबाव के कारण चर्चा बदल जाते हैं या फिर निर्णय बदल जाते है. कोई भी नेता ईगो में आकर पीछे नहीं हटना चाहता है क्योंकि उसे कमजोरी माना जाता है. असली दिक्कतें यही से शुरू होती है जब निर्णय सही क्या है की बजाएं कौन जीतेगा पर आधारित हो जाता है तो लड़ाई बढ़ता चला जाता है. आज के दौर में युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं लड़े जाते पब्लिक परसेप्शन और ग्लोबल प्रेशर कभी बहुत बड़ा किरदार होता है.  नेताओं को अपनी प्रतिष्ठा मजबूत दिखानी होती है, चाहे उसके लिए सख्त फैसले ही क्यों ना लेना पड़े.

लेकिन इस कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है क्या जीत सच में किसी की होती है? आपको बता दे की युद्ध में कोई भी पूरी तरह नहीं जीतता है. एक तरफ भले ही कोई देश जीत का दवा करें लेकिन नुकसान दोनों तरफ ही होती है चाहे  वो आर्थिक सामाजिक और मानवीय ही क्यों ना हो. इसीलिए कई विशेषज्ञ का मानना है कि मॉडर्न वर्ल्ड में युद्ध आखिरी विकल्प होनी चाहिए ना की प्रतिष्ठा की लड़ाई. 
इसका मतलब यह नहीं है की हर युद्ध सिर्फ प्रतिष्ठा के वजह से ही होता है .कई बार देश की सुरक्षा ,आतंकवाद या बॉर्डर की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाने जरूरी होते हैं .

Tags:warpolitics warwar countrieswar vs leader egoEgo clash between leader and war

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