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रोचक: मुकदमे बाजी में कैसे घिसता है जूता और कैसे बर्बाद हो जाती है जिंदगी! जानिए इस खबर में

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: March 28, 2026, 12:24:29 PM

TNP DESK- पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर एक नाम तेजी से वायरल हो रहा है रणवीर सिंह यादव. एक ऐसा नाम जिसके पीछे छुपी है 40 साल की लंबी, कठिन और प्रेरणादायक संघर्ष की कहानी. यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि हौसले, धैर्य और कभी हार न मानने की मिसाल है.

रणवीर सिंह यादव की यह कहानी भारतीय न्याय व्यवस्था और सरकारी सिस्टम की कड़वी सच्चाई को आईने की तरह दिखाती है. मात्र 5 पैसे के लिए एक ईमानदार बस कंडक्टर की पूरी जिंदगी अदालतों के चक्कर काटते हुए बीत गई.

जानिए पूरा कहानी

रणवीर सिंह यादव 1973 में DTC में बस कंडक्टर थे जिनपर ₹0.10 की टिकट के बजाय ₹0.15 काटकर 5 पैसे खुद के पास रखने का इल्ज़ाम लगा. उसी आरोप में रणवीर यादव को 1976 में नौकरी से निकाल दिया गया और DTC ने केस भी किया.

सालों तक केस लड़ने के बाद 1990 में उन्हें लेबर कोर्ट से जीत मिली लेकिन मामला यहीं नहीं थमा DTC फिर हाईकोर्ट पहुंच गई. हाईकोर्ट में 40 साल चले केस में DTC ने 5 पैसे वसूलने के लिए करीब 47000 रुपए खर्च कर दिए जबकि 5 पैसे का सिक्का 1994 में ही बंद हो गया था.

आखिर में 2016 में रणवीर सिंह यादव को जीत मिली और उन्हें 30 हजार मुआवजा, 1.28 लाख ग्रेच्युटी और 1.37 लाख CPF दिया गया. रणवीर सिंह यादव के लिए ये 5 पैसे से ज्यादा मान और सम्मान की लड़ाई बन गई थी जिसमें निर्दोष व्यक्ति के 40 साल चले गए.

सोचिए जिस सिस्टम को भ्रष्टाचार रोकना चाहिए था, उसने एक निर्दोष व्यक्ति को घसीटने के लिए जनता के 47,000 रुपये फूंक दिए, जबकि आरोप सिर्फ 5 पैसे का था.

1976 में नौकरी से निकाले जाने के बाद, 40 साल तक चली इस कानूनी लड़ाई ने रणवीर सिंह के जीवन के सबसे कीमती साल छीन लिए. 2016 में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला तो आया, लेकिन क्या वह न्याय पर्याप्त है?

सिस्टम का दोहरा चेहरा

आम आदमी के लिए 5 पैसे के हेर-फेर जो शायद एक मानवीय भूल थी के लिए 40 साल का वनवास और सामाजिक कलंक.

रसूखदारों के लिए करोड़ों-अरबों का घोटाला करने वाले सफेदपोश आज भी लंदन की गलियों में आज़ाद घूम रहे हैं, जबकि कानून के हाथ उन तक पहुँचने में दशकों लगा देते हैं. यह मामला केवल रणवीर सिंह यादव का नहीं है, बल्कि उन हजारों 'रणवीर' का है जो छोटे-छोटे आरोपों में अपनी पूरी उम्र और जमा-पूंजी न्याय की आस में गंवा देते हैं. जब तक छोटे प्यादों पर सख्ती और बड़े मगरमच्छों पर नरमी का यह खेल चलता रहेगा, तब तक न्याय सिर्फ तारीखों के ढेर में दबा रहेगा.

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