TNP Explainer झारखंड में सूचना आयोग की हालिया नियुक्तियों ने एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस को हवा दे दी है. जिन पदों को पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक निगरानी का सबसे अहम स्तंभ माना जाता है, वही अब राजनीतिक संतुलन और कथित “हिस्सेदारी” के आरोपों में घिरते नजर आ रहे हैं. इस पूरे घटनाक्रम ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सूचना आयोग जैसी अर्ध-न्यायिक संस्था भी सत्ता और विपक्ष के बीच “आपसी समझौते” का मंच बनती जा रही है?
नियुक्तियों में ‘बंटवारा’ का आरोप
सूत्रों के अनुसार, झारखंड सूचना आयोग में कुल पांच सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की गई. इनमें से दो पद पत्रकारों को दिए गए, जबकि शेष तीन पदों पर ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त किया गया, जिनकी पहचान सीधे तौर पर राजनीतिक दलों से जुड़ी रही है.
इनमें झामुमो से जुड़े प्रवक्ता और आईटी सेल के सदस्य तनुज खत्री, कांग्रेस के महामंत्री अमूल रंजन खलको और भाजपा प्रवक्ता शिव पूजन के नाम प्रमुख रूप से सामने आए हैं.
आलोचकों का आरोप है कि यह नियुक्तियां योग्यता या निष्पक्षता के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक “संतुलन” साधने के लिए की गई हैं. यानी सत्ता पक्ष और विपक्ष ने मिलकर इन पदों का बंटवारा कर लिया, ताकि सभी पक्षों की “भागीदारी” सुनिश्चित हो सके.
चयन प्रक्रिया पर उठते सवाल
सूचना आयुक्तों की नियुक्ति सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत एक चयन समिति द्वारा की जाती है. इस समिति में मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री शामिल होते हैं.
झारखंड में इस प्रक्रिया में मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी तथा अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हाफिजुल हसन की भूमिका रही.
कानूनी तौर पर यह प्रक्रिया पूरी तरह वैध मानी जाती है, लेकिन सवाल इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि क्या चयन प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई है? क्या पहले से तय नामों पर सिर्फ मुहर लगाने का काम हुआ?
कानून क्या कहता है?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार, सूचना आयुक्त बनने के लिए व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित होना आवश्यक है. साथ ही उसे कानून, प्रशासन, समाज सेवा, पत्रकारिता, विज्ञान या प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में व्यापक अनुभव होना चाहिए.
सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि नियुक्त व्यक्ति निष्पक्ष, स्वतंत्र और गैर-राजनीतिक होना चाहिए, ताकि वह बिना किसी दबाव के निर्णय ले सके, यहाँ तक कि अगर वह निर्णय सरकार के खिलाफ ही क्यों न हो.
यहीं पर वर्तमान नियुक्तियां सवालों के घेरे में आ जाती हैं. यदि कोई व्यक्ति सक्रिय रूप से किसी राजनीतिक दल से जुड़ा रहा है या उसका पदाधिकारी रहा है, तो क्या वह सूचना आयोग जैसे संवेदनशील पद पर पूरी निष्पक्षता के साथ काम कर पाएगा?
परंपरा बनाम नई ‘मिसाल’
झारखंड में अब तक एक अनौपचारिक परंपरा रही है कि सक्रिय राजनीति से जुड़े लोगों को सूचना आयोग में सीधे तौर पर नियुक्त करने से बचा जाता था. हालांकि यह जरूर देखा गया कि सत्ता के करीब माने जाने वाले पत्रकारों या प्रशासनिक पृष्ठभूमि के लोगों को प्राथमिकता दी जाती रही है.
लेकिन इस बार जिस तरह से खुले तौर पर राजनीतिक चेहरों को आयुक्त बनाया गया है, उसे एक “नई और विवादित मिसाल” के तौर पर देखा जा रहा है.
यह भी उल्लेखनीय है कि लंबे समय से सूचना आयुक्तों के कई पद खाली पड़े थे. अदालतों ने इस पर सख्त रुख अपनाया और राज्य सरकार को नियुक्तियां करने के निर्देश दिए. ऐसे में उम्मीद थी कि इस बार पारदर्शिता और योग्यता को प्राथमिकता दी जाएगी, लेकिन आरोप है कि इस प्रक्रिया में भी “खेला” हो गया.
राजनीतिक बयानबाजी और पुरानी टिप्पणियां
इस पूरे विवाद के बीच झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य का एक पुराना बयान फिर से चर्चा में आ गया है. उन्होंने कभी भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि “अगर उन्हें उनका हिस्सा मिल जाए, तो वे हल्ला मचाना बंद कर देंगे.”
अब जब नियुक्तियों में भाजपा से जुड़े व्यक्ति का नाम सामने आया है, तो यह बयान फिर से राजनीतिक गलियारों में गूंजने लगा है. इससे यह धारणा और मजबूत हो रही है कि कहीं न कहीं सत्ता और विपक्ष के बीच एक “अनकहा समझौता” हुआ है.
राहुल गांधी की लाइन बनाम जमीनी हकीकत
एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार देश में पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना के अधिकार को मजबूत करने की बात करते रहे हैं. वे कई मंचों से संस्थाओं की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की बुनियाद बताते हैं.
लेकिन झारखंड में कांग्रेस द्वारा अपने ही संगठन के महामंत्री को सूचना आयुक्त बनाए जाने की अनुशंसा ने पार्टी की नीति और व्यवहार के बीच अंतर को उजागर कर दिया है.
यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है—एक तरफ सिद्धांतों की बात और दूसरी तरफ राजनीतिक हितों को प्राथमिकता?
निष्पक्षता पर सबसे बड़ा संकट
सूचना आयोग केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि एक अर्ध-न्यायिक निकाय है, जो नागरिकों को सूचना के अधिकार को लागू करने में मदद करता है. यह सरकार और प्रशासन के फैसलों की समीक्षा करता है और कई मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई भी करता है.
झारखंड में सूचना आयोग ने समय-समय पर नगर निगम की व्यवस्था, साफ-सफाई, भ्रष्टाचार और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर हस्तक्षेप किया है.
ऐसे में यदि आयोग के भीतर ही राजनीतिक प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ जाती है, तो उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ सकता है. आम नागरिकों के मन में यह संदेह पैदा हो सकता है कि क्या आयोग के फैसले पूरी तरह निष्पक्ष होंगे या उनमें राजनीतिक झुकाव झलकेगा?
क्या न्यायपालिका करेगी हस्तक्षेप
अब इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका हस्तक्षेप करेगी? सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट पहले भी सूचना आयोगों में नियुक्तियों को लेकर सख्त रुख अपना चुके हैं.
यदि इन नियुक्तियों को अदालत में चुनौती दी जाती है, तो यह मामला एक बड़े संवैधानिक परीक्षण का रूप ले सकता है. अदालत यह जांच कर सकती है कि क्या चयन प्रक्रिया में योग्यता, निष्पक्षता और पारदर्शिता के सिद्धांतों का पालन किया गया या नहीं.
यदि अदालत को प्रक्रिया में कोई खामी नजर आती है, तो इन नियुक्तियों को रद्द भी किया जा सकता है या फिर नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया जा सकता है.
संस्थाओं की विश्वसनीयता दांव पर
झारखंड का यह मामला सिर्फ एक राज्य की प्रशासनिक नियुक्तियों का विवाद नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर उठते सवालों का प्रतीक बन गया है.
सूचना आयोग को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है,एक ऐसी संस्था जो सरकार को जवाबदेह बनाती है और नागरिकों को सशक्त करती है.
अगर वही संस्था राजनीतिक समीकरणों का शिकार हो जाए, तो यह लोकतंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए गंभीर खतरा बन सकता है.
अब नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इस “गजब कहानी” में न्याय और निष्पक्षता का संतुलन बहाल हो पाएगा या फिर यह मामला लंबे समय तक सियासी बहस और कानूनी लड़ाई का हिस्सा बना रहेगा.