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सिर्फ 48 घंटे के आंदोलन में Gen-Z ने ध्वस्त किया नेपाल, PM-मंत्री देश छोड़कर भागे, क्या इतना कमजोर था शासकीय तंत्र, पढ़िए पूरी डिटेल

BY -
Vinita Choubey  CE
Vinita Choubey CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 15, 2026, 12:17:47 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : नेपाल हिंसा और अराजकता की आग में जल रहा है. Gen-Z ने प्रदर्शन कर महज 48 घंटे में पूरे नेपाल को ध्वस्त कर दिया. कई मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया. नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली देश छोड़कर फरार हो गए. नेपाल के राष्ट्रपति को भी इस्तीफा देना पड़ा. इस प्रदर्शन में अबतक 20 लोगों की मौत हो गई है, जबकि 2 हजार से अघिक लोग घायल है. इस प्रदर्शन को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे है कि क्या वाकई वहां का शासकीय तंत्र इतना कमजोर था. क्या फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भ्रष्टाचार और प्रतिबंध के कारण युवा इतने नाराज थे कि प्रदर्शन इतना हिंसक रूप ले लिया. सवाल यह भी उठ रहें हैं कि नेपाल सरकार ने जब 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बैन क्यों लगाया, तो चाईनीज ऐप TikTok इससे कैसे बच गया. आखिर ऐसी क्या हुआ कि युवाओं में इतनी नाराजगी पनप गई.

विरोध प्रदर्शनों के पीछे संगठन 'हामी नेपाल' की बड़ी भूमिका

इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे सोशल मीडिया और एक गैर-सरकारी संगठन 'हामी नेपाल' की बड़ी भूमिका रही. इस एनजीओ ने छात्रों को संगठित करने के लिए इंस्टाग्राम और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया. इन साइटों पर 'विरोध कैसे करें' जैसे वीडियो पोस्ट किए गए, जिनमें छात्रों को कॉलेज बैग और किताबें लाने और स्कूल यूनिफॉर्म पहनकर विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की सलाह दी गई. सोमवार को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने 'यूथ्स अगेंस्ट करप्शन' का बैनर भी लहराया, जिसे हामी नेपाल ने ही जारी किया था. स्थानीय मीडिया के अनुसार, इस संगठन ने काठमांडू प्रशासन से विरोध प्रदर्शन की अनुमति भी ली थी.

क्या इतना कमजोर था शासकीय तंत्र!

राजधानी काठमांडू समेत कई बड़े शहरों में कर्फ्यू जैसे हालात हैं. सरकारी इमारतों, पुलिस थानों और प्रशासनिक कार्यालयों पर प्रदर्शनकारियों ने कब्ज़ा कर लिया है. कई जगहों पर सरकारी दस्तावेज़ों और संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया गया. नेपाल पुलिस और सेना प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने में नाकाम रही, जिसके बाद सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं. लेकिन तब तक सोशल मीडिया के ज़रिए आंदोलन इतना फैल चुका था कि इसे रोकना नामुमकिन हो गया था.

यह आंदोलन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन से शुरू हुआ था. सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया कि ये प्लेटफ़ॉर्म फ़र्ज़ी ख़बरें और आपत्तिजनक सामग्री फैलाने के लिए ज़िम्मेदार हैं. लेकिन युवाओं का आरोप है कि असली वजह सरकार के बढ़ते भ्रष्टाचार को छुपाना है. उनका मानना ​​था कि टिकटॉक पर प्रतिबंध इसलिए नहीं लगाया गया क्योंकि इसके पीछे चीन का दबाव था, जो नेपाल की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाता है. यही युवाओं के गुस्से को और भड़काने का कारण बना.

Gen-Z के युवाओं ने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करके आंदोलन को संगठित किया. उन्होंने वीपीएन और अन्य तकनीकों के ज़रिए प्रतिबंध तोड़ा और जानकारी साझा की और आंदोलन को बड़े पैमाने पर फैलाया. दो दिनों के भीतर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए. हालात तब और बिगड़ गए जब सरकार ने लाठीचार्ज और गोलीबारी का सहारा लिया. सेना भी तैनात की गई, लेकिन वह भी भीड़ को नियंत्रित नहीं कर सकी.

अब नेपाल पूरी तरह अराजकता की स्थिति में है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ रही है कि इस आंदोलन का असर क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है. भारत, चीन और संयुक्त राष्ट्र इस पर कड़ी नज़र रख रहे हैं. नेपाल का भविष्य इस समय अनिश्चितता के भंवर में फँसा हुआ है. पिछले 48 घंटों में काठमांडू और अन्य शहरों में भड़के हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने न केवल वहाँ की राजनीतिक स्थिरता को हिलाकर रख दिया है, बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देशों को भी गहरी चिंता में डाल दिया है. सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के विरोध में शुरू हुआ यह जनांदोलन भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ युवाओं के गुस्से का प्रतीक बन गया है.

 

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