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जल, जंगल और जमीन के आईने में कैसा हो ‘हमीन कर बजट’, जीडीपी से हटकर तय करने होंगे सुख के मानक

जल, जंगल और जमीन के आईने में कैसा हो ‘हमीन कर बजट’, जीडीपी से हटकर तय करने होंगे सुख के मानक

रांची(RANCHI): जल, जंगल और जमीन को अपनी राजनीति का केन्द्र बिन्दू मानती रही झामुमो की सरकार वर्ष 2023-24 के लिए बजट बनाने की प्रक्रिया में जुट गयी है. वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव इसकी तैयारियों में जुटे हुए हैं, माना जा रहा है कि हेमंत सरकार इस बार लोक लुभावन बजट ला सकती है, बजट को लोकलुभावन और जनोन्मुखी बनाने के लिए अलग-अलग सामाजिक समूहों से राय ली जा रही है, सरकार का वादा है कि अच्छे सुझावों का स्वागत किया जायेगा, और उसके अनुरुप ही बजट का निर्माण किया जायेगा, आम नागरिक भी बजट से जुड़े अपने सुझावों को पोर्टल पर रख सकता है.

खेतीबाड़ी पर निर्भर है हमारी 71 फीसदी आबादी

यहां याद रहे कि झारखंड की 71 फीसदी आबादी खेतीबाड़ी पर निर्भर है, खनिज सम्पदाओं से भरपूर यह राज्य आज भी दूसरे राज्यों को मजदूरों की आपूर्ति करता है, जम्मु कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हमारे मजदूर अपना पसीना बहाते नजर आयेगें, कारण मात्र इतना है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम अपने श्रमिकों को राज्य में काम मुहैया करवाने में असफल रहें और यह स्थिति तब है कि टाटा से लेकर दर्जनों औद्योगिक घरानों झारखंड में कार्यरत हैं, लेकिन इन औद्योगिक घरानों में हमारे श्रमिकों को काम नहीं मिलता, लेकिन जब हमारे यही श्रमिक दूसरे राज्यों में जाते हैं तब इनकी कार्यकुशलता क्यों ठीक हो जाती है, यह एक अहम प्रश्न है. हमारे राज्य में कार्यरत औद्योगिक घराने हमारे मजदूरों को काम देने में पीछे क्यों हैं, इसके लिए सरकार को कठोर नीतियों का निर्माण करना ही होगा.

कोविड काल में खेतीबाड़ी ने किसानों और युवाओं को रोजगार मुहैया करवाया  

यहां यह याद रहे कि कोविड काल में जब दूसरे विकसित राज्यों में हायतौबा की स्थिति मची हई थी, काम छोड़-छोड़ कर हमारे मजदूर वापस झारखंड लौट रहे थें, यही खेतीबाड़ी उन्हे और उनके परिवारों को आजीविका मुहैया करवा रही थी.

जिस मनरेगा का कभी मजाक बनाया जाता था, वहीं मनरेगा हमारे मजदूरों को रोजगार प्रदान कर रहा था. लेकिन आज भी हमारे सिंचाई के साधन बेहद कमजोर है. जरुरत हमारे खेतों में पानी पहुंचाने की है. यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हमारा पानी बिहार की नदियों में बहता है. हम उस पानी को अपने खेतों तक पहुंचाने में असफल रहे हैं.

आदिवासी-मूलवासियों के आकांक्षाओँ के अनुरुप बजट का निर्माण एक चुनौती

पिछली बार हेमंत सरकार ने 10101 लाख करोड़ का बजट पेश किया था, माना जाता है कि इस बार का बजट उससे 10 फीसदी ज्यादा का होगा, सरकार की कोशिश बजट को आदिवासी-मूलवासियों के आकांक्षाओँ के अनुरुप बनाने की होगी. पिछली बार हेमंत सरकार ने आदिवासी-मूलवासियों को दृष्टिगत रख कई योजनाओं का शिलान्यास किया था, माना जाता है कि इस बार उन योजनाओं को विस्तार दिया जायेगा, उसके लिए बजट का आवंटन में वृद्धि की जायेगी.

सरकार पर आरोप आवंटित राशि को खर्च नहीं कर पाती सरकार

लेकिन सरकार पर एक बड़ा आरोप यह भी है कि यह आवंटित बजट को खर्च नहीं कर पाती, जिसके कारण बजट में दिखाई गयी, राशि को वर्ष के अंत में सरेंडर करना पड़ता है, और इस प्रकार सरकार के दावे महज कागजी बन कर रह जाते हैं.

कोल्ड स्टोरेज का निर्माण, सोलर एनर्जी निर्माण, डिजिटल पंचायत में काम करना होगा

सरकार को आम जनों से मिले सुझाव के अनुरुप ही कोल्ड स्टोरेज का निर्माण, सोलर एनर्जी निर्माण, डिजिटल पंचायत, स्टार्टअप के लिए सीड फंड, एमएसएमई क डिजिटल पंचायत, एमएसएमई क्लस्टर का गठन, सीएचसी और पीएचसी स्तर के सरकारी अस्पतालों का सुदृढ़ीकरण और लाइवलीहुड प्रमोशन के कार्य करने होंगे. 

जीडीपी से हटकर तय करने होंगे सुख के मानक

यहां याद रहे कि भाजपा से जुड़े रहे गोविंदाचार्य ने भी लगातार जमीन, जल, जंगल, जानवर के साथ जन अनुकूल नीतियों का निर्माण की वकालत की थी. तब उन्होंने कहा था कि विकास का रास्ता यही है. हमें विकास की अवधारणा में बुनियादी बदलाव लाने की जरुरत है. हमें जीडीपी से हटकर सुख के मानक तय करने होंगे. उनके मुताबिक जब समाज आगे और सत्ता पीछे चलेगी तभी स्वस्थ निर्माण होगा, अभी की स्थिति यह है कि सत्ता के पीछे समाज भाग रहा है और यह स्थिति अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने कहा था कि प्राकृतिक संसाधनों का पोषण ही विकास है, देश में 127 ईको एग्रो क्लाइमेटिक जोन हैं. प्रत्येक की अपनी-अपनी अलग खासियत है. इन्हें विकेंद्रित विकास का केंद्र बनाना है. शायद हमें गोविंदाचार्य से सबक लेने की जरुरत है.

रिपोर्ट: देवेन्द्र कुमार

Published at:31 Jan 2023 12:29 PM (IST)
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