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बिहार में दादा थे पुलिस के नजर में मोस्ट वांटेड, पोती ने यूपीएससी क्वालीफाई कर परिवार का बढ़ाया मान

BY -
Priyanka Kumari CE
Priyanka Kumari CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: March 7, 2026, 3:32:18 PM

टीएनपी डेस्क(TNP DESK):यूपीएससी ने अपना रिजल्ट जारी कर दिया है जिसमे देश के अलग-अलग हिस्सों से परीक्षा पास करने वाले छात्रों की प्रेरणादायक कहानियां सुनने और देखने को मिल रही है.इसी बीच बिहार के एक परिवार की चर्चा पूरे देश में जोर-शोर से हो रही है.दरअसल यूपीएससी परीक्षा में बिहार के सहरसा जिले में रहने वाली आकांक्षा सिंह ने यूपीएससी में 301वीं रैंक हासिल कर इतिहास रचा है.आपको बता दें कि यूपीएससी ने 6 मार्च को सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम घोषित किया है जिसमे आकांक्षा की सफलता अब देश में चर्चा का विषय बन गया है हालांकी इसके पीछे की वजह काफी दिलचस्प है.

काफी दिलचस्प है आकांक्षा की कहानी

यूपीएससी में 301वीं रैंक लाने वाली सहरसा जिले की आकांक्षा ने अपनी प्रेरणा का स्रोत अपने दादा ब्रह्मेश्वर मुखिया को बताया है जिनकी साल 2012 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.आकांक्षा सिंह के दादा कोई आम आदमी नहीं थे. बताया जाता है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया लम्बे समय तक जेल में रहे, वह पुलिस की नजर में मोस्ट वांटेड थे.ऐसे में यूपीएससी परीक्षा पास करने के बाद उनकी पोती चर्चा का विषय बन चुकी है.आकांक्षा ने अपनी सफलता के पीछे अपनी प्रेरणा अपने दादा को बताया है.

अपने दादा को प्रेरणा मान किया पढ़ाई

आकांक्षा ने अपनी सफलता की कहानी बताते हुए कहा कि बचपन से ही वह अपने दादा के बारे में सवाल पूछती थी जब वह थोड़ी बड़ी और समझदार हुई तो परिवार से पूछा कि उनके दादा कहां है लेकिन इसका कभी भी सीधा जवाब परिवार वालों ने नहीं दिया.बाद में उन्हें पता चला कि उनके दादा लंबे समय तक जेल में रहे और समाज के लिए संघर्ष करते रहे.दादा के इस संघर्ष की वजह से उनका परिवार 10-20 साल तक पीछे चला गया लेकिन आकांक्षा के दादा की कहानी ने उनको प्रेरित किया और उनकी वजह से वह यूपीएससी में 301 भी रैंक हासिल की.

आखिर कौन है ब्रह्मेश्वर मुखिया

अब आपको बता दें कि आखिर आकांक्षा सिंह के दादा ब्रह्मेश्वर मुखिया कौन थे तो ब्रह्मेश्वर मुखिया बिहार के भोजपुर जिले के खोपिरा गांव के रहने वाले थे.वे रणवीर सेना के संस्थापक के रूप में जाने जाते है. साल 1990 में जब बिहार में नक्सली संगठन और बड़े किसानों के बीच संघर्ष का दौर आया, तो 1994 में रणवीर सेना का गठन हुआ था.इस निजी सेना को उस समय बिहार की जातीय संघर्ष की राजनीति में अहम माना जाता है.संघर्षों की वजह से ब्रह्मेश्वर मुखिया को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा था. साल 2011 में उन्हें जेल से रिहा किया गया लेकिन 2012 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

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