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Explainer: क्या नीतीश अब राजनीति “वनप्रस्थ” की ओर है! सेहत, वारिस या भाजपा की रणनीति? सच्चाई क्या है

BY - Rajesh Tomar

Published at: 06 Mar 2026 06:38 PM (IST)

Explainer: क्या नीतीश अब राजनीति “वनप्रस्थ” की ओर है! सेहत, वारिस या भाजपा की रणनीति? सच्चाई क्या है

पटना(PATNA)बिहार की राजनीति में जब भी कोई बड़ा मोड़ आता है, उसके केंद्र में अक्सर एक ही नाम होता है, नितीश कुमार . पिछले दो दशकों में उन्होंने जिस तरह से सत्ता को संभाला, खोया और फिर वापस हासिल किया, वह भारतीय राजनीति में एक अलग ही मिसाल माना जाता है. इसलिए जब उनके भविष्य या संभावित “राज्यसभा जाने” जैसे संकेतों की चर्चा होती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सचमुच उनकी राजनीतिक पारी का अंत है, या फिर इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छिपी है.

सेहत और उम्र का सवाल

सबसे पहला तर्क उनकी उम्र और सेहत से जुड़ा है. Nitish Kumar अब 70 पार कर चुके हैं और पिछले कुछ समय में सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता पहले जैसी नहीं दिखती. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा कई बार उठी है कि लगातार सत्ता की राजनीति और प्रशासनिक दबाव का असर उनकी सेहत पर पड़ रहा है.

हालांकि यह भी सच है कि भारतीय राजनीति में उम्र कभी निर्णायक बाधा नहीं रही. उदाहरण के लिए Narendra Modi, Sharad Pawar या Mamata Banerjee जैसे नेता भी लंबी उम्र में सक्रिय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं. इसलिए सिर्फ सेहत को आधार बनाकर यह मान लेना कि नितीश सक्रिय राजनीति से हटना चाहते हैं, पूरी तरह तार्किक नहीं लगता.

क्या निशांत को विरासत देने की तैयारी?

दूसरा बड़ा सवाल उनके बेटे Nishant Kumar को लेकर उठता है. भारतीय राजनीति में वंशवाद कोई नई बात नहीं है. लगभग हर बड़े क्षेत्रीय दल में किसी न किसी रूप में राजनीतिक विरासत देखने को मिलती है.

लेकिन नितीश कुमार का अब तक का राजनीतिक चरित्र इससे अलग रहा है. उन्होंने हमेशा खुद को “विचार और संगठन” की राजनीति का नेता बताया है, न कि परिवार आधारित राजनीति का. Nishant Kumar अब तक सार्वजनिक रूप से राजनीति से दूरी बनाए हुए हैं और शायद ही किसी राजनीतिक मंच पर सक्रिय दिखे हों.

इसलिए यह कहना कि नितीश सिर्फ बेटे को जगह देने के लिए राजनीति का समीकरण बदल रहे हैं, अभी तक ठोस आधार पर खड़ा नहीं दिखता.

जदयू के अंदर की राजनीति

तीसरा पहलू Janata Dal (United) यानी जदयू के अंदर की राजनीति से जुड़ा है. लंबे समय तक पार्टी का पूरा ढांचा नितीश के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा. लेकिन समय के साथ कई महत्वाकांक्षी नेता उभरे हैं, जो पार्टी में अपनी जगह मजबूत करना चाहते हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेता के आसपास असंतोष की परतें बनती ही हैं. यह असंतोष खुलकर सामने आए या न आए, लेकिन सत्ता परिवर्तन की चर्चा होते ही ऐसे तत्व सक्रिय हो जाते हैं.

हालांकि अब तक ऐसा कोई ठोस संकेत नहीं मिला है कि जदयू के भीतर किसी गुट ने खुलकर नितीश के खिलाफ मोर्चा खोला हो.

भाजपा की रणनीति का पहलू

बिहार की राजनीति में Bharatiya Janata Party की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है. पिछले कई वर्षों में भाजपा ने देश के कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करते हुए धीरे-धीरे अपना राजनीतिक विस्तार किया है.

कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह तर्क देते हैं कि भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति में क्षेत्रीय दलों को धीरे-धीरे कमजोर करना भी शामिल रहा है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या नितीश को राज्यसभा भेजने या सक्रिय सत्ता से दूर करने जैसी कोई रणनीति हो सकती है.

लेकिन इस तर्क की एक बड़ी कमजोरी भी है. बिहार में भाजपा और नितीश का गठबंधन कई बार टूटा और फिर बना है. हर बार दोनों पक्षों ने राजनीतिक मजबूरी और गणित को देखते हुए साथ आने का फैसला किया. इसलिए यह कहना कि भाजपा ने कोई “राजनीतिक सुपारी” देकर नितीश को किनारे कर दिया, अभी तक सिर्फ राजनीतिक अटकल ही माना जाएगा.

नितीश की अपनी राजनीतिक शैली

असल सवाल यही है कि क्या पलटी मारकर सत्ता में बने रहने के लिए मशहूर नितीश इतनी आसानी से किसी और की चाल में फंस सकते हैं.

पिछले दो दशकों का इतिहास बताता है कि Nitish Kumar बिहार की राजनीति के सबसे चतुर और व्यावहारिक नेताओं में गिने जाते हैं. उन्होंने कई बार असंभव लगने वाले राजनीतिक समीकरणों को भी अपने पक्ष में बदला है.

इसी कारण कई विश्लेषक मानते हैं कि अगर भविष्य में उनके राज्यसभा जाने या सक्रिय सत्ता से थोड़ा पीछे हटने जैसी कोई स्थिति बनती भी है, तो वह उनकी मजबूरी नहीं बल्कि रणनीति भी हो सकती है. यह भी संभव है कि वह पार्टी और सरकार की कमान किसी नए चेहरे को देकर खुद “मार्गदर्शक” की भूमिका में आना चाहें.

नितीश पर सबकी निगाहें

फिलहाल सच्चाई यही है कि बिहार की राजनीति में नितीश कुमार अब भी सबसे केंद्रीय चेहरा बने हुए हैं. उनकी सेहत, पारिवारिक विरासत, पार्टी के अंदरूनी समीकरण और भाजपा की रणनीति, इन सभी पहलुओं पर चर्चा हो सकती है, लेकि न किसी एक कारण को निर्णायक बताना अभी जल्दबाजी होगी.

राजनीति में अक्सर दिखने वाली तस्वीर ही पूरी सच्चाई नहीं होती. नितीश कुमार जैसे अनुभवी नेता के मामले में तो यह और भी ज्यादा सच है. इसलिए यह कहना ज्यादा तार्किक होगा कि बिहार की राजनीति में उनका अगला कदम ही तय करेगा कि यह “वनप्रस्थ” है या फिर किसी नई राजनीतिक चाल की शुरुआत.

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