धनबाद (DHANBAD): धनबाद रेल मंडल के अधिकारी उलझन में पूरी तरह उलझ गए हैं. उनके आगे गड्ढा है, तो पीछे खाई है. वह प्रोटोकॉल का उदाहरण दे रहे हैं, लेकिन इस प्रोटोकॉल में कैसे गड़बड़ी हुई, कैसे पहले निमंत्रण दिया गया, फिर वापस लिया गया, यह वह नहीं बता पा रहे हैं. रेल अधिकारियों को कहना है कि उनसे चूक हो गई है और उस चूक को समेटने के लिए वह लगातार कोशिश कर रहे हैं. रेलवे के अधिकारी मंगलवार को सिंह मेंशन भी गए थे. उन लोगों ने मेयर संजीव सिंह और विधायक रागिनी सिंह से मुलाकात भी की. अपनी बात कही, संजीव सिंह और रागिनी सिंह ने भी रेल अधिकारियों से कई सवाल किये. संजीव सिंह ने तो रेल अधिकारियों के समक्ष कहा कि मेरे जाने से किसी का "ब्लड प्रेशर" बढ़ जाता. इसलिए ऐसा किया गया.
विवाद तूल पकड़ता जा रहा, जनप्रतिनिधि भी एकजुट हो रहे BJP
बहरहाल, विवाद तूल पकड़ता जा रहा है. धीरे-धीरे जनप्रतिनिधि भी एकजुट हो रहे हैं. उनका कहना है कि आज किसी एक जनप्रतिनिधि के साथ रेल अधिकारियों ने ऐसा किया है, क्या गारंटी है कि कल दूसरे किसी जन प्रतिनिधि के साथ ऐसा नहीं होगा? रेलवे अधिकारियों के किसी भी कथन पर सवाल उठ जा रहे हैं. अब पूछा जाने लगा है कि जब केवल सांसद और विधायकों को ही बुलाना था तो फिर विधायक रागिनी सिंह का नाम बैनर से क्यों हटाया गया? इसका जवाब रेलवे के अधिकारियों के पास नहीं है. संजीव सिंह भी कह रहे हैं कि एक "चिल्लाने" वाले नेता के दबाव में यह सब किया गया है और ऐसा कर रेल अधिकारियों ने जनता का अपमान किया है. मेयर संजीव सिंह की विधायक पत्नी रागिनी सिंह ने इस पूरे मामले में कड़ा रुख अख्तियार कर रखा है. उन्होंने केंद्रीय रेल मंत्री से भी इस मामले की शिकायत की है.
आखिर रेल अधिकारियों ने इतनी बड़ी गलती कैसे कर दी?
आखिर रेल अधिकारियों ने इतनी बड़ी गलती कैसे कर दी? क्या कुछ रेल अधिकारियों पर गाज भी गिर सकती है? अगर मामले की जांच हुई तो अधिकारी तो अपनी सफाई में असलियत बताएंगे ही. वह अपनी नौकरी क्यों देंगें. हालांकि मंगलवार को दिनभर रेल अधिकारियों ने मामले को सुलझा लेने का प्रयास किया, लेकिन मामला उलझता जा रहा है. मेयर संजीव सिंह के समर्थक गुस्से में हैं. वह डीआरएम का पुतला दहन कर रहे हैं. बात भी थोड़ी अजीब हुई थी, पहले संजीव सिंह को निमंत्रण भेजा गया, फिर कार्यक्रम के कुछ देर पहले नहीं आने को कहा गया.
कार्यक्रम शुरू होने के कुछ देर पहले बैनर भी बदला गया था
इतना ही नहीं, कार्यक्रम शुरू होने के कुछ घंटे पहले वहां लगे पोस्टर को बदल दिया गया. पोस्टर से संजीव सिंह और रागिनी सिंह का फोटो हटा दिया गया. सवाल उठता है कि रेल अधिकारियों ने क्या यह सब अपनी मर्जी से किया या किसी के दबाव में. यह बात भी सच है कि दबाव देने वाले अब अपना हाथ खींच लेंगे और रेल अधिकारियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. ऐसा भी हो सकता है कि कुछ छोटे पदाधिकारी को "बलि का बकरा" बनाकर मामले को लीपा पोती करने की कोशिश हो. लेकिन यह सब अभी भविष्य के गर्भ में है. मेयर संजीव सिंह को अगर निर्दल मान भी लिया जाये तो रागनि सिंह तो भाजपा की विधायक है. रेल मंत्री भाजपा के हैं, तो क्या वह अपनी पार्टी की विधायक के साथ इस वर्ताव को स्वीकार करेंगे।यह सवाल धीरे-धीरे और बड़ा होता जा रहा है.
रिपोर्ट - धनबाद ब्यूरो