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ड्रेस कोड पर विवाद : गोड्डा कॉलेज का ड्रेस कोड या पितृसत्तात्मक सोच! प्रिंसिपल और छात्रा आमने सामने

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: February 1, 2026, 2:47:08 PM

गोड्डा / दुमका: भारत का संविधान समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन झारखंड के गोड्डा कॉलेज, गोड्डा से सामने आया मामला इन संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देता दिख रहा है। ड्रेस कोड का मामला यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या जेंडर इक्वलिटी आज भी सिर्फ कागज़ों और भाषणों तक सीमित है।

छात्रा का आरोप : पहनावे के नाम पर क्लास रूम से किया बाहर

बी.एड सेमेस्टर 1 की छात्रा मोना भारती का आरोप है कि कॉलेज प्रशासन और कुछ प्रोफेसर उन्हें उनके पहनावे के कारण लगातार कॉलेज में प्रवेश करने से रोक रहे हैं। हद तो तब हो गई जब पहनावे को लेकर क्लास रूम से बाहर निकाल दिया गया। मोना का कहना है कि उन्हें “लड़कों जैसे कपड़े” पहनने का ताना देकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है और उनकी पढ़ाई बाधित हो रही है।

ड्रेस कोड में नहीं, सोच में फर्क

छात्रा के अनुसार, कॉलेज द्वारा जारी ड्रेस कोड में कहीं भी लड़कियों और लड़कों के लिए अलग अलग कपड़ों का उल्लेख नहीं है। निर्देशों में केवल ड्रेस का रंग तय किया गया है, जिसका वह पूरी तरह पालन कर रही हैं। इसके बावजूद उन्हें आपत्ति का सामना करना पड़ रहा है। मोना भारती बताती हैं कि वह फॉर्मल शर्ट और पैंट इसलिए पहनती हैं क्योंकि इसी पहनावे में वह खुद को सहज, सुरक्षित और आत्मविश्वास से भरा महसूस करती हैं। उनका सवाल है कि जब नियमों का पालन हो रहा है, तो फिर आपत्ति किस आधार पर?

“लड़की हो, लड़की बनकर रहो”

मोना का आरोप है कि कॉलेज के कुछ प्रोफेसर उन्हें सार्वजनिक रूप से यह कहकर अपमानित करते है कि तुम लड़की हो, लड़की बनकर रहो और सूट पहनकर कॉलेज आओ। यह बयान सिर्फ एक छात्रा पर नहीं, बल्कि पूरे समाज की पितृसत्तात्मक सोच को उजागर करता है।

प्राचार्य का बयान, बढ़ता विवाद

इस मामले पर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. विवेकानंद सिंह ने कहा कि सभी छात्र छात्राओं को ड्रेस कोड का पालन करना होगा और छात्रा को लड़कियों की तरह सूट पहनकर ही कॉलेज आना चाहिए। उनका यह बयान विवाद को और गहरा करता है।

सूट खरीदने की पेशकश, लेकिन सवाल कायम?

प्राचार्य ने यह भी कहा कि अगर छात्रा के पास सूट खरीदने के पैसे नहीं हैं, तो उसका खर्च वह खुद उठाने को तैयार हैं। हालांकि सवाल यह नहीं है कि सूट कौन खरीदेगा, सवाल यह है कि क्या किसी छात्रा की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को इस तरह नियंत्रित किया जा सकता है?

किताबों में जेंडर इक्वलिटी, व्यवहार में भेदभाव

विडंबना यह है कि यही कॉलेज अपने पाठ्यक्रम में जेंडर इक्वलिटी, महिला सशक्तिकरण और समान अधिकारों की पढ़ाई कराता है, लेकिन जब एक छात्रा इन्हें अपने जीवन में अपनाती है, तो उसे अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है।

ड्रेस कोड से आगे, अधिकारों की लड़ाई

अब यह मामला सिर्फ ड्रेस कोड का नहीं रह गया है। यह सवाल बन चुका है कि क्या शिक्षण संस्थानों को महिलाओं के शरीर, कपड़ों और पहचान को नियंत्रित करने का अधिकार है? गोड्डा कॉलेज का यह मामला पूरे शिक्षा तंत्र के लिए चेतावनी है। अगर आज भी लड़कियों को बराबरी की बजाय सीमाएं सिखाई जा रही हैं, तो जेंडर इक्वलिटी का दावा खोखला ही कहा जाएगा।

अब निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर

इस बाबत जब हमने सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी दीपक कुमार से बात की तो उन्होंने कहा कि ड्रेस कोड के निर्धारण में विश्वविद्यालय की कोई भूमिका नहीं होती। कॉलेज स्तर से निर्धारित होता है। फिलहाल यह मामला जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब यह देखना दिलचस्प है कि कॉलेज प्रशासन आत्ममंथन करता है या एक छात्रा की आवाज़ को खामोशी में दबा दिया जाएगा। क्या उस परिस्थिति में भी विश्वविद्यालय प्रशासन मूक दर्शक बनी रहेगी खासकर तब जब कुलपति खुद महिला हो!

रिपोर्ट: अजीत / पंचम

Tags:Dress code controversyGodda College's dress code or patriarchal thinkingGodda College Jharkhand

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