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क्या आप जानते हैं उस कद्दावर महिला को, जिसने संसद में 27 साल पहले महिला आरक्षण विधेयक पेश कर डाला था...

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 1:36:44 AM

टीएनपी डेस्क(Tnp desk)आज संसद में महिलाओं के हक-हुकूक औऱ बराबरी के बोलकर फिंजा में गर्माहट के साथ-साथ खुशियां तैर रही है. लेकिन, इस महिला आरक्षण विधेयक के मांग की बुनियाद और बीज 27 साल पहले संसद भवन बो दिया गया था. आज अगर वो महिला न होती तो शायद ही आज महिलाओं के सशक्तीकरण, बराबरी और वजूद को लेकर इतनी चर्चा और चेहरे पर मुस्कान खिली होती . लेकिन, उस नारी ने दुरदर्शिता, उत्थान की सोच और संवैधानिक ताकत के जरिए एक महिला को इस पुरुष समाज में खड़ा करने की एक चिंगारी उनके दिल में भड़क रही थी , तब ही 12 सितंबर 1996 में संसदीय और विधायी सीटों पर महिला आरक्षण की मांग करते हुए संसद के पटल पर निजी सदस्य का विधेयक पेश कर दिया था. सोचिए उस महिला की सोच, नेकनियती, दूरदर्शिता ,काबलियत और नजरिए को, जिसके सपने आज पूरा होने वाले. उसकी सोच जमीन पर उतरने वाली है. इससे ज्यादा इस देश की महिलाओं के अरमान साकार होने को है.

गीता मुखर्जी ने पेश किया था विधेयक  

महिला आरक्षण की बुनियाद रखने वाली पश्चिम बंगाल की पूर्व सांसद दिवगंत गीता मुखर्जी थी, जिसने सितंबर 1996 में महिलाओं के 33 प्रतिशत आऱक्षण की मांग संसद में की थी. पूरी जिंदगी सादा जिवन उच्च विचार रखने वाली गीता को अंदर से यह अहसास हो गया था कि बिना आरक्षण महिला के सशक्तीकरण और उनकी जिंदगी के बदलाव के बारे में नहीं सोचा जा सकता था. इसके लिए वो इतनी ईमानदार , दृढनिश्चय और आत्मविश्वास से लबरेज थी कि इस मुद्दे पर कभी भी पीछे बोलने से नहीं हटी.

सात बार की सांसद रही है गीता मुखर्जी

अपनी जीते जी आम आवाम के बीच गीता मुखर्जी इतनी लोकप्रिय रही कि हर कोई उनकी तारीफ करते नहीं थकता था. बेहद ही साफ-सुधरी छवि और सादे ढंग से जिंदगी जीने वाली गीता बंगाल के तत्कालीन अविभाजित मेदिनीपुर जिले के पांशकूड़ा निर्वाचन क्षेत्र (अब परिसीमन के कारण अस्तित्वहीन) से सात बार भाकपा की लोकसभा सदस्य रहीं. इसी से उनके कद का अंदाजा लगया जा सकता था कि , उनका किस तरह की जमीनी पकड़ लोगों के बीच रही और क्यों लोग उन्हे पसंद करते थे. एक जनप्रतिनिधि की क्या शख्सियत रहनी चाहिए, वो जिंदगी के आखिरी क्षण तक लोगों को बता गई..  

गीता दी के नाम से मशहूर  

मुखर्जी अक्सर अपनी पार्टी के साथियों और मीडियाकर्मियों के बीच काफी मशहूर थी, अपनी जीवनशैली और मृदु स्वाभव के चलते सभी उनके मुरीद बन जाते थे. इसी का नतीजा था कि सब उन्हें गीता-दी के नाम से सभी पुकारते थे. वो अक्सर बोला करती थी कि महिलाओं को समाज निर्माण में उनकी उचित पहचान मिले और वे पर्याप्त संख्या बल के साथ संसदीय और विधायी मंचों पर अपने अधिकारों की आवाज उठाएं.

पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता की थी बहन

भारतीय सांसद और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री स्वर्गीय इंद्रजीत गुप्ता की छोटी बहन गीता मुखर्जी थी. इसके साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट स्वर्गीय बिश्वनाथ मुखर्जी की पत्नी भी थी. यानि उनका परिवार सियासी था , जिसके चलते राजनीति का पाठ औऱ तजुर्बा उनमे अच्छी तरीके से मौजूद था.  हालांकि, उनकी बेहद विनम्र जीवनशैली लोगों को काफी पसंद आती थी. गीता जब तक संसद में रही, आम आवाम की आवाज जोर-शोर से उठाती रही. उनकी सादगी एक मिसाल थी, जिसका जिक्र आज भी होता है. वो जब तक जिंदा रही ,  नई दिल्ली और हावड़ा के बीच यात्रा साधारण थ्री-टीयर स्लीपर क्लास में  किया, उन्हें ये पसंद था . गीता मुखर्जी इस दुनिया को छोडकर 4 मार्च 2000 को चली गई. उनके निधन से सभी ने राजनीति की एक युग का अंत माना था.

बेशक गीता मुखर्जी तो इस दुनिया में नहीं है, लेकिन, जो उन्होंने आज से 27 साल पहले महिलाओं के हक के लिए जो आरक्षण की मांग की थी . वो सपना आज पूरा होने वाला है. हालांकि, ये सच्चाई है कि जब-जब महिला आरक्षण पर बात उठेगी, तो पश्चिम बंगाल की गीता मुखर्जी का नाम भी बेहद इज्जत से लिया जाएगा, क्योंकि, वो ही महिला आरक्षण की पहली पैरवीकार थी.

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