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धनबाद लोकसभा : ढुल्लू महतो और अनुपमा सिंह की जंग में कौन किसके पक्ष में, सवर्ण और शहरी वोटरों का समर्थन किसके साथ?

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 9:46:03 AM

धनबाद(DHANBAD):  धनबाद लोकसभा से भाजपा के प्रत्याशी बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो हैं तो कांग्रेस से अनुपमा सिंह चुनाव लड़ रही है . अनुपमा सिंह सवर्ण  जाति  से आती है तो ढुल्लू महतो  ओबीसी से आते है. धनबाद संसदीय क्षेत्र में अब तक सवर्ण  जातियों का दबा रहा है लेकिन इस बार भाजपा ने OBC कार्ड  खेलते हुए बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो को उम्मीदवार बनाया है. धनबाद लोकसभा क्षेत्र में  शहरी (किसी भी केटेगरी के )  वोटर निर्णायक  फैक्टर होते है. वैसे यहां निरसा , सिंदरी और चंदनकियारी  में ग्रामीण वोटर भी कम नहीं है. 2019 के लोकसभा चुनाव में धनबाद विधानसभा में   55.3% वोटिंग हुई थी, जबकि झरिया में 50. 4% मत पड़े थे. इसी प्रकार बोकारो में 53.3 प्रतिशत मत पड़े थे ,जबकि चंदन कियारी विधानसभा क्षेत्र में 73.73 प्रतिशत, निरसा विधानसभा क्षेत्र में 67.79 प्रतिशत और सिंदरी विधानसभा क्षेत्र में 71. 49 प्रतिशत वोट पड़े थे. वैसे धनबाद लोकसभा क्षेत्र में कुल 60.37 प्रतिशत वोटिंग हुई थी. धनबाद लोकसभा क्षेत्र में आते हैं झरिया, चंदन कियारी, निरसा,धनबाद,बोकारो और सिंदरी. निरसा,सिंदरी और चंदन कियारी ग्रामीण क्षेत्र में चिन्हित है.

धनबाद पर रहा है सवर्ण जातियों का दबदबा 
 
1971 के बाद धनबाद लोकसभा क्षेत्र से जितने भी उम्मीदवार विजय हुए हैं सभी सवर्ण  जाति से आते है. राम नारायण शर्मा हो,  शंकर दयाल सिंह हो, एके  राय हो, रीता वर्मा हो, ददई  दुबे हो या पशुपतिनाथ सिंह हो, सभी सवर्ण वर्ग से  आते हैं, लेकिन इस बार भाजपा ने कुर्मी कार्ड  खेला है  और ढुल्लू  महतो को उम्मीदवार बना दिया है. यह  अलग बात है कि धनबाद लोकसभा क्षेत्र में शहरी वोटर  महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है. भाजपा प्रत्याशी भी कोयला मजदूर संगठन से जुड़े हुए हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी अनुपमा सिंह के पति अनूप सिंह भी कोयला मजदूर संगठन से जुड़े हुए है. बीसीसीएल  और सीसीएल की कोलियरियों  में इनकी हनक है. ऐसे में शहरी मतदाता किस ओर  झुकेंगे, इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा. वैसे पशुपतिनाथ सिंह का टिकट काटकर ढुल्लू महतो को  देना भी लोगों को  नहीं पच रहा है(भाजपा के लोग भी शामिल है) तो अनुपमा सिंह को भी टिकट देना स्थानीय लोगों को नहीं पच रहा है. कांग्रेसी भी इसमें शामिल है. ऐसे में शहरी मतदाता किस ओर  झुकेंगे, इस पर परिणाम निर्भर करेगा. 

कोयला मजदूरों की भी होती है भूमिका 
 
यह अलग बात है कि धनबाद लोकसभा क्षेत्र में कोयला मजदूरों की भी भूमिका होती है. कोयला मजदूर अगर एक तरफा किसी के तरफ चले जाएं तो  जीत हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद कोयला मजदूरों की संख्या में लगातार कमी होती आई है. मजदूर संगठन भी अब इतने ताकतवर नहीं रह गए है. वैसे ,1971 और 1977 में धनबाद लोकसभा में जिस ढंग का चुनाव प्रचार हुआ,वह इतिहास बन  गया. ऐसा उसके बाद कभी नहीं हुआ और आगे भी होने की संभावना बिल्कुल नहीं है. अब तो सब कुछ बदल गया है. 1971 में जहां एक निर्दलीय प्रत्याशी ने धनबल का उपयोग किया, वही 1977 के चुनाव में  धन बल गौण  हो गया. उसका कोई महत्व ही नहीं रह गया. जेल में बंद एके  राय चुनाव जीत गए. 1971 और 1977 का चुनाव आज भी लोगों को रोमांचित करता है. 

1971 में  हेलीकॉप्टर के भरोसे चुनाव प्रचार हुआ  था

 1971 में जहां हेलीकॉप्टर के भरोसे चुनाव प्रचार किया गया था, वही 1977 में कार्यकर्ताओं ने खिचड़ी के भरोसे चुनाव में एके राय  को जीत दिला थी. 1971 के चुनाव में हेलीकॉप्टर का दिखना लोग  अनोखा मानते थे. हेलीकॉप्टर पर चढ़ना तो सपना के समान था. 1971 में लड़ाई जनबल  और धनबल के बीच थी. . इसी प्रकार 1977 में जब चुनाव हुआ तो जेल से ही एके राय  ने नामांकन भर दिया. लेकिन पैसे की कमी थी, चुनाव के लिए संचालन समिति गठित की गई थी. बीसीसीएल, एफसीआई और बोकारो स्टील कारखाना के मजदूर आकार  चुनाव प्रचार करते थे. ना बैनर, ना पोस्टर , और ना कोई होर्डिंग, केवल दीवार लेखन और घर-घर प्रचार के दम पर एके  राय चुनाव जीत गए थे. सामने कांग्रेस के प्रत्याशी राम नारायण शर्मा थे. लेकिन उन्हें 63000 से भी अधिक मतों से हार  का सामना करना पड़ा था. आज तो चुनाव का परिदृश्य  से बदल गया है अब ना खिचड़ी के भरोसे चुनाव लड़े जाते हैं और नहीं खुद के पैसे से कार्यकर्ता प्रत्याशी के लिए गांव-गांव घूमते है. गांव-गांव घूम कर एक मुट्ठी चावल भी नहीं  मांगते है. 

रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 

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