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TNP special : आदिवासी समाज पर मंडराता खतरा! परंपरा छूट रही है, उम्र टूट रही है ये है पहाड़िया जनजाति का हाल

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 15, 2026, 12:00:32 AM

टीएनपी डेस्क- आधुनिकता के इस व्यापक फलक पे  हम चाँद पे तो जा रहे हैं  सागर में  सेतु तो बना रहे हैं लेकिन हम अपनी उम्र को नहीं बचा पा रहे हैं. इंडियन कॉउन्सिल ऑफ मेडिकल रीसर्च और स्वीडेन की मेडिकल शोध संस्थान फोटें द्वारा एक शोध किया जा रहा है कि झारखंड की आदिम जनजातियों की और स्वीडेन की जनजातियों की उम्र लगातार कम हो रही है. आज इनकी औसत उम्र लगभग 40 से 45 साल हो गयी है. जो परिपक्व जवानी की उम्र होती है उस उम्र में ये मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं. आखिर ऐसा किस कारण होता है ,इन दोनों देशों के रिसर्च टीम द्वारा ये पता लगाया जा रहा है. 

रिसर्चरों का मानना है कि ये अपने पारंपरिक रहन सहन और खान पान से दूर हो रहे हैं.  यही प्रबल कारण मिल रहा है जिस कारण इनकी उम्र घट रही है. इनकी पारंपरिक भोजन के तौर पे मकई,बाजरा, जौ का सत्तू,कोदई ,मड़वे की रोटी ,भात ,मांस,मछली, पक्षी का मांस ,जंगल का कंद मूल,फल इत्यादि हुआ करता है. ये सभी विशुद्ध और बेहद पौष्टिक हुआ करता है. लेकिन बाजार के भ्रामक दौर में ये सब चींजें पीछे छूटते जा रहे हैं. इनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है. ये बाजार आतें हैं मजदूरी करने,मेहनत खूब होता है ,वातावरण बाजारू हो जाता है ,केमिकली वातावरण,प्रदूषण शरीर में जाता है और खाने पीने के नाम पे पेट भर भोजन भी नहीं मिल पाता है. बाजार आने के प्रचलन से इनकी पारंपरिक रहन सहन के साथ साथ पौष्टिकता से भरपूर वाली खेती ,वो घूम घूम कर पक्षी मारना , सुवर पालना में घोर कमी आयी है. इससे इनके स्वास्थ्य पे बेहद बुरा असर पड़ा है. इस कारण इनकी उम्र में कमी आयी है. पहाड़िया मूलतः दो वर्गों में होते हैं एक माल पहाड़िया , दूसरा सौरिया पहाड़िया. इसमें सौरिया पहाड़िया की स्थिति माल पहाड़िया से बेहतर है. माल पहड़िया की स्थिति बहुत दयनीय है. इनकी उम्र ही औसतन बहुत नीचे आ गयी है. इनपर शोध करने के लिए आईसीएमआर ने रिम्स पीएसएम विभाग को 1.5 करोड़ रुपये का फंड दिया है. मुख्य शोधकर्ता के रूप में डॉ. विद्यसागर और उप मुख्य शोधकर्ता के रूप डॉ. देवेश कुमार हैं. इनकी टीम में डॉ. अनिल कुजूर ,डॉ. मोनालिसा ,डॉ. प्रवीर ,और डॉ. धनंजय शामिल हैं .शोध के लिए दुमका के काठीकुंड प्रखंड को चुना गया है. क्योंकि माल पहड़िया जनजाति की संख्या यहां सबसे ज्यादा है. 

शोध करने के लिए वृद्धों का एक समूह बनाया जाएगा. जिसका नाम होगा "वनफूल". इनसे ही इनके पुराने  रहन- सहन की व्यवस्था,खान-पान की स्थिति की तुलनात्मक बातचीत की जाएगी और शोध टीम आकलन करेगी कि कहां क्या समस्या है जिस कारण इस तरह की भयावह स्थिति बनी. पहले किस तरह का भोजन किया जाता था जिससे इनकी उम्र अधिक  होती थी और आज के युवा किस तरह का भोजन मिल पा रहा है जिसके कारण इनकी उम्र में गिरावट आई है. 

स्वीडेन में भी इसी तरह की स्थिति है ,वहां की भी सामी जनजाति की यही स्थिति है. वहां के शोधकर्ताओं ने पाया कि सामी जनजाति के लोग रेनडियर मिट अपने खाने में खूब उपयोग करते थे , जो आजकल उन्हें नही मिल पाता है. यह मुख्य समस्याओं में  से एक था. अब स्वीडेन सरकार ने रेनडियर मिट इन जनजातियों को निःशुल्क मुहैया कराते है. ठीक इसी तरह शोध में मिलने वाली कमियो को चिन्हित किया जाएगा. दोनों देशों के शोधकर्ताओं के निष्कर्ष के बाद आवश्यक कमी को सरकार निःशुल्क मुहैया कराएगी, जिनसे इन जनजातियों की पारंपरिक भोजन को पूरा किया जा सकेगा. 

 रिपोर्ट: प्रकाश कुमार 

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